रायपुर/छत्तीसगढ़ भाजपा की नवनियुक्त प्रभारी स्मृति ईरानी अपने दो दिवसीय दौरे पर रायपुर पहुंचीं तो उन्होंने पार्टी के नेताओं, विधायकों और पदाधिकारियों से परिचयात्मक मुलाकात की तथा संगठनात्मक बैठक में हिस्सा लिया। पहले दिन की इस बैठक को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। अनुशासन को लेकर कही गई सामान्य बातों को भी कुछ लोगों ने ‘फटकार’ का रूप दे दिया। मेरा मानना है कि किसी बात को उसके वास्तविक संदर्भ में समझे बिना उसे सनसनीखेज अंदाज में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
स्वाभाविक है कि जब कोई बड़ा नेता पहली बार किसी प्रदेश का प्रभार संभालता है, तो संगठन के कई नेता, विधायक और मंत्री उनके करीब रहने तथा अपनी सक्रियता दिखाने की कोशिश करते हैं। राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। हर कोई चाहता है कि नए प्रभारी के सामने उसकी अच्छी छवि बने और संगठन में उसकी सक्रियता दिखाई दे। ऐसे में यदि कोई वरिष्ठ नेता शुरुआत में ही अपनी अपेक्षाएं स्पष्ट कर दे और कार्यकर्ताओं तथा नेताओं को उनकी सीमाओं का एहसास करा दे, तो इसे नकारात्मक नजरिए से देखने के बजाय भविष्य के लिए एक अच्छी पहल भी माना जा सकता है।
स्मृति ईरानी ने होर्डिंग, बैनर और पोस्टर के अनावश्यक प्रदर्शन से बचने, फिजूलखर्ची नहीं करने और आगे-पीछे गाड़ियों का काफिला लेकर चलने जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहने का संदेश दिया। आखिर इसमें फटकार जैसी कौन-सी बात है? किसी संगठन का प्रभारी यदि अपने साथियों को सादगी, अनुशासन और अनावश्यक खर्च से बचने की सलाह देता है, तो यह उसकी संगठनात्मक जिम्मेदारी का ही हिस्सा है। इसे विवाद बनाने के बजाय इस संदेश के पीछे की भावना को समझने की जरूरत है।
भाजपा का राजनीतिक सफर अभाव, संघर्ष और कार्यकर्ताओं की मेहनत से होकर गुजरा है। पार्टी ने अपने लंबे संघर्ष के बाद सत्ता और संगठन में यह मुकाम हासिल किया है। लेकिन सत्ता में आने के बाद यदि नेताओं के आसपास दिखावे, तामझाम और अनावश्यक सुविधाओं का दायरा बढ़ने लगे, तो जनता और कार्यकर्ताओं से दूरी भी बढ़ सकती है। सत्ता का वैभव और संगठन की सादगी, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी राजनीतिक दल के लिए जरूरी है। ऐसे में स्मृति ईरानी की नसीहत को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उनके रायपुर प्रवास के दौरान कुछ ऐसे दृश्य भी सामने आए, जो उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली के बारे में एक अलग संदेश देते हैं। देर शाम वे बिना फॉलो पायलट के अकेले ही मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से तथा पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निवास पर मुलाकात के लिए पहुंचीं। उन्होंने अपने आपको लो-प्रोफाइल रखा और एक स्थान पर जमीन पर बैठकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात भी सुनी। इन प्रसंगों को केवल सामान्य गतिविधियां मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। राजनीति में कई बार बड़े संदेश भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार और कार्यशैली से दिए जाते हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि पहले दिन की बैठक मुख्य रूप से परिचयात्मक थी। न तो इसे किसी बड़ी नीतिगत बैठक का स्वरूप दिया जाना चाहिए और न ही ऐसी किसी बैठक के बारे में निष्कर्ष निकालना चाहिए, जिसमें अभी व्यापक संगठनात्मक समीक्षा हुई ही नहीं। किसी नए प्रभारी की पहली बैठक में परिचय होता है, एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है और संगठन की कार्यशैली को जानने की शुरुआत होती है। इसके बाद होने वाली मुलाकातों में संगठन की वास्तविक स्थिति, सरकार के कामकाज, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा आगे बढ़ती है।
यह भी राजनीति की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि जब कोई नया प्रभारी आता है, तो उससे मिलने-जुलने वालों के माध्यम से उसे संगठन और सरकार के बारे में अलग-अलग तरह की जानकारियां मिलती हैं। कोई अपनी बात रखता है, कोई अपनी शिकायत बताता है और कोई दूसरे के बारे में अपनी राय भी व्यक्त करता है। इसे राजनीति की सामान्य कार्यप्रणाली से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसलिए पहली बैठक के आधार पर किसी बड़े विवाद या अंदरूनी खींचतान का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
हां, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पहली बैठक में कुछ हुआ ही नहीं। सत्ता में बैठे नेताओं और सरकार के प्रतिनिधियों को समय-समय पर यह याद दिलाना जरूरी होता है कि जनता और कार्यकर्ता ही किसी राजनीतिक संगठन की असली ताकत हैं। यदि स्मृति ईरानी ने शुरुआत में ही सादगी और अनुशासन पर जोर दिया है, तो इससे प्रदेश के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच एक सकारात्मक संदेश जा सकता है। सत्ता में रहते हुए संगठन की मर्यादा बनाए रखना और जनता के बीच सहज उपलब्ध रहना भाजपा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना किसी अन्य राजनीतिक दल के लिए।
मेरा स्पष्ट मानना है कि खबरों की हेडिंग देखकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय पूरे घटनाक्रम को समझना चाहिए। राजनीति में कयास लगाए जाते हैं, चर्चाएं होती हैं और छोटी-छोटी बातों के अलग-अलग अर्थ निकाले जाते हैं। लेकिन हर नसीहत फटकार नहीं होती, हर निर्देश विवाद नहीं होता और हर सामान्य बैठक के पीछे कोई बड़ी राजनीतिक कहानी हो, यह भी जरूरी नहीं है।
स्मृति ईरानी ने छत्तीसगढ़ में अपनी पहली ही बैठक और प्रवास के दौरान सादगी तथा अनुशासन का जो संदेश दिया है, उसे सकारात्मक रूप में देखा जाना चाहिए। भाजपा के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर है कि सत्ता में रहते हुए उसका संगठन किस तरह अपनी पुरानी संघर्षशील पहचान, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और सादगी की परंपरा को कायम रख सकता है। आखिरकार, राजनीति में जनता का विश्वास बड़े काफिलों, होर्डिंग और बैनरों से नहीं, बल्कि नेताओं के व्यवहार, कार्यशैली और उनके काम से अर्जित होता है।
(सृष्टि मारकंडे)