कुछ वक्त पहले ऐसा लगता था कि छत्तीसगढ़ सरकार आयुष्मान योजना के पैसे जानबूझकर रोक रही है पर अब समझ आया कि सरकार ने आयुष्मान योजना का पैसा रोककर गरीबों का इलाज नहीं रोका था बल्कि सरकारी खजाने के पैसे के गलत इस्तेमाल की आशंका पर सवाल उठाए थे। अब 18 निजी अस्पतालों की हुई जांच और हो रही कार्रवाई ने उन सवालों को और गंभीर बना दिया है। जिन निजी अस्पतालों की ओर से भुगतान को लेकर सरकार पर सवाल उठाए जा रहे थे, उन्हीं में मरीजों की वास्तविक भर्ती, रिकॉर्ड और आयुष्मान दावों में गड़बड़ी की जांच हो रही है जिसमें बेईमानी के कई सबूत दिखाई दिए है। यानी सरकार के फैसले को गरीब विरोधी बताने से पहले यह सवाल जरूरी है कि सरकारी पैसा आखिर किस इलाज के लिए मांगा जा रहा था? यहां पर यह भी बताना जरूरी है कि पिछले ही महीने यूपी में आयुष्मान योजना में गड़बड़ी पर 318 अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई, 6 साल में 61 अस्पताल सस्पेंड तथा 648 पैनल से बाहर किए जा चुके है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार से भी दोषी निजी अस्पतालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की अपेक्षा की जा सकती है।
रायपुर/ आयुष्मान कार्ड गरीब के लिए उम्मीद है। बीमारी के समय जब जेब खाली हो, तब यही कार्ड उसे भरोसा देता है कि इलाज पैसों के अभाव में नहीं रुकेगा। लेकिन अगर इसी कार्ड को कुछ निजी अस्पतालों ने कमाई का जरिया बना लिया हो तो इससे गंभीर अपराध और क्या होगा?
28 सितंबर को सामने आई एक मीडिया पड़ताल में आयुष्मान योजना के नाम पर कथित कमीशन के खेल का खुलासा हुआ था। कुछ तथ्य सामने आए थे कि जिसमें “आयुष्मान वाले मरीज लाओ, 15 प्रतिशत कमीशन ले जाओ।” की तर्ज पर काम हो रहा है।
निजी अस्पतालों में दलालों के जरिए मरीज लाने और कुछ मरीजों को गंभीर बताकर भर्ती करने जैसे आरोप सामने आए थे। जिस पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहां तक की तथ्य सामने आने पर कड़ी कार्रवाई करेंगे।
अब 1 अक्टूबर को स्वास्थ्य विभाग ने रायपुर समेत सात जिलों के 18 निजी अस्पतालों पर कार्रवाई करते हुए जांच शुरू की है। जांच में अस्पतालों के रिकॉर्ड, वास्तविक भर्ती मरीजों की संख्या, डॉक्टरों और स्टाफ की उपलब्धता तथा आयुष्मान योजना के तहत किए गए दावों का मिलान किया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ मामलों में रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर भी सामने आया है।
ऐसे में अब अब सवाल बदल गया है। जो लोग कल तक पूछ रहे थे कि सरकार आयुष्मान का पैसा क्यों रोक रही है? निजी अस्पताल गरीबों का इलाज कैसे करेंगे? उनसे आज एक सीधा सवाल है सरकार पैसा दे, बिल्कुल दे; लेकिन किसके इलाज का पैसा दे? वास्तविक मरीज का या कागजों में पैदा किए गए मरीज का?
अस्पतालों को उनके वास्तविक इलाज का भुगतान मिलना चाहिए। इसमें दो राय नहीं हो सकती। लेकिन सरकारी खजाने से भुगतान लेने के लिए अगर मरीजों की संख्या बढ़ाई गई, फर्जी भर्ती दिखाई गई, रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया या गंभीर बीमारी के नाम पर अनावश्यक इलाज का दावा किया गया, तो यह महज कागजी गड़बड़ी नहीं है। यह गरीब के अधिकार पर भी हमला है।
आयुष्मान योजना में पैसा सरकार का नहीं, जनता का है। वह पैसा किसी अस्पताल की मनमानी कमाई के लिए नहीं है बल्कि उस गरीब परिवार के इलाज के लिए है जो अस्पताल का लाखों का बिल अपनी जेब से नहीं भर सकता।
इसलिए जरूरी है कि इस मामले में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो अस्पताल संचालक से लेकर डॉक्टर, कर्मचारी और कथित दलालों तक पूरे नेटवर्क की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। गलत तरीके से लिया गया सरकारी पैसा वापस होना चाहिए और जहां आपराधिक कृत्य प्रमाणित हों, वहां एफआईआर और कानून के मुताबिक कठोर दंड की कार्रवाई होनी चाहिए।
यह सुनिश्चित होना चाहिए कि गरीब की बीमारी किसी की अवैध कमाई का जरिए नहीं बनने देना है। उसके आयुष्मान कार्ड पर किसी का कमीशन तय नहीं हो सकता। उसके इलाज के नाम पर सरकारी खजाने से पैसा निकालना कोई सामान्य गलती नहीं मानी जा सकती। 18 अस्पतालों पर छापे कार्रवाई और मिले तथ्य निश्चित रूप से बड़े खुलासे की राह बनाएंगे।
जांच में यह भी सामने लाना चाहिए कि कितने मरीज वास्तव में भर्ती हुए, कितने मरीजों के नाम पर दावे किए गए, कितने दावों का भुगतान हुआ, कितनी रकम संदिग्ध है और इस पूरे खेल में अस्पतालों के अलावा कौन-कौन लोग शामिल थे।
सरकार ने अगर भुगतान रोका था तो अब उसकी वजह भी सामने आती दिख रही है। भुगतान रोकना गलत था या सरकारी पैसे की जांच करना जरूरी था। इसका फैसला भावनाओं से नहीं, जांच की रिपोर्ट से होना चाहिए।
लेकिन एक बात साफ है आयुष्मान गरीब की ढाल है, किसी के लिए सरकारी खजाना लूटने का यंत्र नहीं है।
अगर गरीब के कार्ड को कमाई का कार्ड बनाने की कोशिश हुई है, तो कार्रवाई भी ऐसी होनी चाहिए कि आगे कोई अस्पताल मरीज की मजबूरी को अपना मुनाफा समझने की हिम्मत न करे। गरीब के इलाज के नाम पर कथित फर्जीवाड़ा अगर साबित होता है तो यह अक्षम्य है।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)