सिर्फ बड़ी इमारतें खड़ी कर देने या मेडिकल कॉलेज का बोर्ड लगा देने से काम पूरा नहीं हो जाता। असली चुनौती तो तब शुरू होती है जब नया विभाग खड़ा करना होता है, छात्रों को मरीजों का इलाज सिखाना होता है और अस्पताल में सही व्यवस्था बनानी होती है।
रायपुर/ छत्तीसगढ़ में पाँच नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं दंतेवाड़ा, जशपुर-कुनकुरी, मनेन्द्रगढ़, जांजगीर-चांपा और कबीरधाम। हर जगह 50-50 सीटें मिलने से गाँवों और दूरस्थ अंचलों के बच्चों के डॉक्टर बनने का सपना सच होता दिख रहा है, लेकिन इस खुशी के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि इन नए कॉलेजों में बच्चों को पढ़ाएगा कौन?
आज हालात यह हैं कि इन संस्थानों में प्रोफेसरों और डॉक्टरों की भारी कमी है, जबकि दूसरी तरफ रायपुर का मेकाहारा और मेडिकल कॉलेज पिछले 60 सालों से छत्तीसगढ़ की चिकित्सा शिक्षा का सबसे बड़ा गढ़ रहा है और यहाँ के डॉक्टरों के पास अच्छा तजुर्बा है। कई डॉक्टर्स तो यहां एक दो दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे है।
यही वह बात है जो प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल से सीधा सवाल पूछने पर मजबूर करती है कि सरकार रायपुर के इन अनुभवी डॉक्टरों के ज्ञान का फायदा नए मेडिकल कॉलेजों को देने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा रही?
मै स्पष्ट कर दूं कि यहाँ किसी भी डॉक्टर को जबरन रायपुर से हटाने की बात बिल्कुल नहीं हो रही है, बल्कि चिंता सिर्फ इतनी है कि राजधानी में बरसों की मेहनत से तैयार हुई विशेषज्ञता का लाभ प्रदेश के बाकी हिस्सों तक क्यों न पहुँचे। सिर्फ बड़ी इमारतें खड़ी कर देने या मेडिकल कॉलेज का बोर्ड लगा देने से काम पूरा नहीं हो जाता। असली चुनौती तो तब शुरू होती है जब नया विभाग खड़ा करना होता है, छात्रों को मरीजों का इलाज सिखाना होता है और अस्पताल में सही व्यवस्था बनानी होती है।
सोचिए, बस्तर या सरगुजा के किसी गरीब परिवार का मरीज जब नए मेडिकल कॉलेज जाता है, तो वह कितनी उम्मीद से डॉक्टर का चेहरा देखता है, लेकिन अगर वहाँ अनुभवी हाथ ही नहीं होंगे, तो उस मरीज को आज भी छोटे-छोटे इलाज के लिए रायपुर ही भागना पड़ेगा। इस समस्या का समाधान बहुत साफ है कि यदि रायपुर के सीनियर प्रोफेसरों और विशेषज्ञों को कुछ समय के लिए जैसे रोटेशन पर या दो-तीन साल के लिए नए मेडिकल कॉलेजों से जोड़ दिया जाए, तो इससे नए कॉलेजों के छात्रों को बेहतरीन गुरुओं का मार्गदर्शन मिलेगा और वहाँ की नई फैकल्टी को भी सीनियर डॉक्टरों के साथ काम करने का बड़ा संबल मिलेगा।
मेकाहारा का यह अनुभव अगर सिर्फ राजधानी की चार दीवारों तक ही बंधा रहा, तो यह दूर-दराज के गाँवों और वहाँ के मरीजों के साथ न्याय नहीं होगा क्योंकि कॉलेज खोलना तो महज एक शुरुआत है, उसे मजबूत और भरोसेमंद बनाना असली काम है। सरकार को अब यह सोचना होगा कि नए कॉलेजों को सिर्फ नई फाइलों और भर्तियों की नहीं, बल्कि पुराने और भरोसेमंद अनुभवों की भी उतनी ही जरूरत है। अब देखना है कि हमारी सरकार इन काबिल और अनुभवी हाथों को वक्त रहते नए कॉलेजों को संवारने की बड़ी जिम्मेदारी कब सौंपेगी।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)