Saturday | Nov 07, 2026
The Raw File

पीएम-अजय (PM-AJAY) योजना: ₹12.49 करोड़ के कौशल प्रशिक्षण में घमासान, सीएमओ तक पहुंची शिकायत इसीलिए गिरी थी आईएएस पर गाज!

“बातचीत से पत्राचार तक पहुंची तकरार, सवाल :पर्दे के पीछे आखिर चल क्या रहा था?”

रायपुर/प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शुमार प्रधानमंत्री अनुसूची जाति अभ्युदय योजना (PM-AJAY) के तहत छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति के युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने के नाम पर एक बड़ा वित्तीय और प्रशासनिक विवाद सामने आया है। ₹12.49 करोड़ के भारी-भरकम बजट और 5,838 हितग्राहियों को प्रशिक्षित करने के लक्ष्य वाली इस योजना में नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और अंदरखाने की खींचतान ने शासन के गलियारों में खलबली मचा दी है। यह खबर हम आज इसलिए बना रहे हैं क्योंकि पर्दे की पीछे की बात बड़े देर से खुली है।

इस पूरे प्रकरण में छत्तीसगढ़ राज्य अंत्यावसायी सहकारी वित्त एवं विकास निगम के तत्कालीन प्रबंध संचालक (MD) जगदीश सोनकर और प्रशिक्षण प्रदाता संस्था ‘एमपीसीओएन’ (MPCON) के प्रतिनिधि अजय रजक आमने-सामने आ गए। मामला सिर्फ संस्था और अधिकारी के बीच पत्राचार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीएम कार्यालय तक शिकायत पहुंचने के बाद एक आईएएस अधिकारी जगदीश सोनकर को किनारे कर दिया गया है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब योजना के क्रियान्वयन के दौरान दोनों पक्षों के बीच संवाद बिगड़ने लगा। दस्तावेजों के मुताबिक इस मामले में सबसे पहले MPCON की ओर से पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट की गई और भुगतान की मांग उठाई गई। इसके बाद अंत्यावसायी निगम के तत्कालीन प्रबंध संचालक जगदीश सोनकर की ओर से भी पत्र जारी किए गए। पत्राचार के इस क्रम से साफ जाहिर होता है कि अंदरखाने कुछ ऐसा पक रहा था, जो धीरे-धीरे बड़े विवाद में बदल गया और बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर गई।

संस्था के गंभीर आरोप: ‘अनुचित मांग’ और ईमेल से शीर्ष स्तर तक दस्तक

एक ओर जहां दोनों पक्षों की आपसी कलह चल रही थी, वहीं MPCON के प्रतिनिधि अजय रजक ने मोर्चा खोलते हुए राज्य के मुख्य सचिव, संबंधित विभागीय सचिव और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को आधिकारिक तौर पर ईमेल भेजकर गंभीर शिकायत दर्ज कराई। MPCON का कहना है कि उन्होंने अपने हिस्से का काम पूरी ईमानदारी से करते हुए 45 प्रशिक्षण बैच, युवाओं का प्रशिक्षण, आकलन और प्रमाण-पत्र देने की प्रक्रिया पूरी कर दी थी, लेकिन इसके बावजूद उनका भुगतान रोक दिया गया।
संस्था के अजय रजक की ओर से मुख्य सचिव और सीएमओ स्तर तक भेजे गए दस्तावेजों में तत्कालीन एमडी जगदीश सोनकर पर सीधे तौर पर “अनुचित और कथित रूप से अनियमित मांग” किए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया, जिसने पूरे मामले को भ्रष्टाचार के रंग में रंग दिया।

कहानी का दूसरा पहलू यह है कि तत्कालीन प्रबंध संचालक जगदीश सोनकर ने भी चुप बैठने के बजाय संस्था (MPCON) के कामकाज और उसकी कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए। एमडी की तरफ से उठाई गई आपत्तियों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता, कक्षाओं में छात्रों की वास्तविक उपस्थिति और अनिवार्य ऑनलाइन मॉनिटरिंग के नियमों की अनदेखी का हवाला दिया गया। इन्हीं कमियों और नियमों के पालन न होने का आधार बनाकर सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण और भुगतानों को रोकने की कार्रवाई का आधिकारिक उल्लेख किया गया था।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट वह रहा, जब दोनों पक्षों की रस्साकशी के बीच किसी ने मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में इस पूरे खेल की गुप्त शिकायत कर दी। जैसे ही मामले की फाइल सीएमओ तक पहुंची और उच्च स्तर पर इसकी सुगबुगाहट तेज हुई, प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए शासन ने त्वरित कदम उठाते हुए तात्कालिक प्रबंध संचालक आईएएस जगदीश सोनकर को उनके पद से हटा दिया।

इस मामले में वर्तमान में विभागीय और प्रशासनिक जांच तेजी से जारी है। वहीं, अंत्यावसायी निगम की नई प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी अब हिना नेताम को सौंप दी गई है।
ऐसे में ₹12.49 करोड़ की इस योजना को लेकर कई ऐसे गंभीर सवाल हैं जिनके जवाब जनता और युवाओं को मिलने चाहिए जैसे वास्तविक धरातल पर क्या हुआ? जब कागजों में गुणवत्ता और उपस्थिति पर सवाल उठाए गए, तो क्या वास्तव में 5,838 हितग्राहियों तक प्रशिक्षण पहुंचा या यह केवल फाइलों का खेल बनकर रह गया? अजय रजक द्वारा शीर्ष स्तर पर लगाए गए “अनुचित मांग” के आरोपों की स्वतंत्र जांच में क्या सामने आ रहा है, और दूसरी तरफ जगदीश सोनकर द्वारा उठाए गए गुणवत्ता व उपस्थिति के सवालों का आधार कितना पुख्ता था?
यदि काम पूरा हुआ था तो प्रशासनिक स्तर पर इतनी रोक-टोक क्यों हुई, और यदि कमियां थीं तो इसके पीछे असली जिम्मेदार कौन है?

यह मामला किसी एक अधिकारी या एक संस्था का नहीं, बल्कि हजारों अनुसूचित जाति के युवाओं के भविष्य और उनके भरोसे का मामला है। सीएमओ तक शिकायत पहुंचने और आईएएस अधिकारी पर गाज गिरने से यह स्पष्ट हो गया है कि दाल में कुछ काला जरूर था। अब देखना यह है कि चल रही जांच में इस पूरे ₹12.49 करोड़ के घालमेल की परतें कितनी खुलकर सामने आती हैं और दोषियों पर क्या कड़ी कार्रवाई की जाती है।

(Rawfile Bureau)


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