Monday | Sep 07, 2026
The Raw File

रैंप पर मुस्कुराती पूर्व नक्सली महिलाएं…और द वायर की कलम में फिर वही नकारात्मकता।

नक्सलवाद से मुख्यधारा तक…पूर्व महिला नक्सलियों की मुस्कान से क्यों परेशान है कुछ लोग?

@देवेंद्र किशोर गुप्ता
रायपुर/ छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व महिला नक्सलियों का रैंप वॉक करना महज एक फैशन शो नहीं था, बल्कि उन महिलाओं के बदलते जीवन की तस्वीर थी, जिन्होंने कभी बंदूक और हिंसा का रास्ता देखा था और आज हथकरघा परिधान पहनकर समाज की मुख्यधारा में आत्मविश्वास के साथ खड़ी दिखाई दीं। लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर को देखने का नजरिया सबका एक जैसा नहीं रहा। द वायर ने इस पूरे आयोजन को एक अलग कोण से पेश किया और बिना नाम बताए किसी पूर्व महिला नक्सली के कथित बयान के आधार पर सवाल खड़े कर दिए कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर रायपुर लाया गया और रैंप वॉक कराया गया। यहां पर सवाल यह है कि क्या किसी एक बयान के आधार पर पूरे आयोजन और उसमें शामिल महिलाओं के अनुभव को खारिज कर देना निष्पक्ष पत्रकारिता है? क्या उन महिलाओं से भी पूछा गया जो रैंप पर चलीं थी? उन्होंने उस पल को कैसे महसूस किया यह पूछा?

उपलब्ध दूसरी कई मीडिया रिपोर्टों में इस आयोजन को आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुकी महिलाओं के आत्मविश्वास और पुनर्वास की सकारात्मक मिसाल के रूप में पेश किया गया है। बाकायदा उनसे बात की गई। साथ ही तस्वीरें भी बहुत कुछ कहती हैं। रैंप पर उतरती महिलाएं किसी दबाव या भय में नहीं, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ दिखाई देती हैं। वे पेशेवर मॉडलों के साथ कदम मिलाकर चल रही थीं। उनके चेहरे पर उत्साह था। यह दृश्य किसी मजबूरी की कहानी से ज्यादा एक बदली हुई जिंदगी की कहानी दिखाई देता है।
फिर सवाल यह होना चाहिए कि आखिर मुख्यधारा में लौटती इन महिलाओं की मुस्कान और आत्मविश्वास को देखने में इतनी परेशानी क्यों है?

नक्सलवाद से सबसे ज्यादा पीड़ा छत्तीसगढ़ ने झेली है। बस्तर के हजारों परिवारों ने हिंसा का दंश देखा है। सुरक्षा बलों के जवान शहीद हुए, निर्दोष ग्रामीण मारे गए और राजनीतिक हिंसा में नेताओं की पूरी पीढ़ियां खत्म हुईं। झीरम घाटी की त्रासदी आज भी छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृति में जिंदा है। ऐसे में यदि कोई महिला बंदूक छोड़कर सिलाई सीखती है, स्वरोजगार की ओर बढ़ती है, समाज में सम्मान के साथ लौटती है और फिर आत्मविश्वास से मंच पर चलती है, तो इसे उपलब्धि की तरह देखा जाना चाहिए न कि संदेह की नजर से।

केंद्र सरकार की पुनर्वास नीति में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को कौशल प्रशिक्षण और समाज की मुख्यधारा में वापस लाने पर जोर दिया गया है। इसलिए सिलाई प्रशिक्षण या कौशल विकास कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है।
यहां पर असली सवाल यह है कि उनके अनुसार अगर किसी महिला ने इस आयोजन पर आपत्ति जताई तो क्या आयोजन में शामिल दूसरी महिलाओं का पक्ष भी उसी गंभीरता से सामने रखा गया? क्या उनसे पूछा गया कि वे रैंप पर क्यों गईं? क्या उन्होंने अपनी इच्छा से हिस्सा लिया? क्या उन्हें यह अनुभव अच्छा लगा? पत्रकारिता का मूल सिद्धांत यही है कि एक पक्ष को पूरी कहानी नहीं बनाया जा सकता। किसी आयोजन पर सवाल उठाना पत्रकारिता का अधिकार है, लेकिन उस आयोजन में शामिल दूसरे पक्ष की आवाज को सामने रखना भी उतना ही जरूरी है।

भारत के लिए नक्सलवाद का अंत केवल सुरक्षा की सफलता नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए नई जिंदगी की शुरुआत है जो दशकों तक लाल आतंक की छाया में जीते रहे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के साथ आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास और कौशल प्रशिक्षण की बात कही है। छत्तीसगढ़ में भी आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को विभिन्न रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिशें होती रही हैं। ऐसे में बस्तर की कोई पूर्व महिला नक्सली जब सिलाई मशीन चलाती है तो वह सिर्फ कपड़ा नहीं सिल रही होती, वह अपने अतीत और भविष्य के बीच की दूरी कम कर रही होती है। और जब वही महिला रैंप पर चलती है तो वह केवल परिधान का प्रदर्शन नहीं कर रही होती, बल्कि यह संदेश दे रही होती है कि बंदूक से रैंप तक का सफर भी संभव है।

छत्तीसगढ़ को अपने इस बदलाव पर शर्म नहीं, गर्व होना चाहिए। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा के नेतृत्व में नक्सल उन्मूलन के साथ पुनर्वास और विकास को भी महत्व दिया जा रहा है। सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता का अधिकार है, लेकिन किसी सकारात्मक पहल में खामी तलाशते समय यह भी देखना जरूरी है कि कहीं हम उस व्यक्ति की आवाज तो नहीं दबा रहे, जिसे वर्षों बाद समाज में सम्मान के साथ खड़े होने का अवसर मिला है।

द वायर की रिपोर्टिंग पर सवाल इसलिए उठता है क्योंकि पत्रकारिता का काम केवल एक असहज बयान को सुर्खी बनाना नहीं है, बल्कि पूरी तस्वीर सामने रखना है। यदि आयोजन में शामिल महिलाओं में से कई स्वयं कह रही हैं कि उन्होंने अपनी इच्छा से हिस्सा लिया, कार्यक्रम का आनंद लिया और आत्मविश्वास के साथ रैंप पर उतरीं, तो उनकी आवाज को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। किसी एक व्यक्ति के अनुभव को पूरे आयोजन का सच बना देना पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।

बस्तर ने बहुत खून देखा है। अब अगर वहां की बेटियां बंदूक छोड़कर हुनर, रोजगार, संस्कृति और आत्मविश्वास की राह पर चल रही हैं, तो इस बदलाव का स्वागत होना चाहिए। नक्सलवाद की सबसे बड़ी हार किसी जंगल में हुई मुठभेड़ नहीं है। नक्सलवाद की सबसे बड़ी हार उस दिन होती है, जब उसका कोई पूर्व कैडर बंदूक छोड़कर समाज की मुख्यधारा में मुस्कुराते हुए कदम रखता है। और शायद यही बदलती तस्वीर उन लोगों को सबसे ज्यादा असहज कर रही है, जो अब भी बस्तर को हिंसा के पुराने चश्मे से देखना चाहते हैं।


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