ऐसा विधायक जो सरकार को भी टोकता है और विपक्ष को भी रोकता है।
रायपुर/ छत्तीसगढ़ विधानसभा में अगर कोई ऐसा नेता है, जिसे सुनने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों बराबर उत्सुक रहते हैं, तो वह हैं पूर्व मंत्री कुरूद विधायक अजय चंद्राकर। उनकी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सत्ता पक्ष के विधायक होकर भी अपनी ही सरकार से ऐसे सवाल पूछते हैं, जैसे विपक्ष का सबसे अनुभवी नेता पूछ रहा हो। कई बार जिन मुद्दों तक विपक्ष भी नहीं पहुंच पाता, उन्हें अजय चंद्राकर तथ्यों, नियमों और पूरी तैयारी के साथ सदन के बीचों-बीच रख देते हैं। उनके सवालों से मंत्री असहज हो जाते हैं, अधिकारी फाइलें खंगालने लगते हैं और पूरा विभाग जवाब तलाशने में जुट जाता है। इसलिए विधानसभा की कार्यवाही देखने वाले अक्सर कहते हैं कि सदन में सरकार को सबसे कठिन सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी का यह वरिष्ठ विधायक पूछता है।
अजय चंद्राकर की राजनीति को केवल सरकार की आलोचना के नजरिए से नहीं समझा जा सकता। उनका अंदाज बिल्कुल अलग है। वे अपनी सरकार की कमियां छिपाने में विश्वास नहीं रखते। जहां चूक दिखाई देती है, वहां बिना लाग-लपेट सवाल करते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि वे अपनी सरकार के विरोधी हैं। जैसे ही विपक्ष तथ्यों से हटकर केवल राजनीतिक आरोपों के सहारे सरकार को घेरने की कोशिश करता है, वही अजय चंद्राकर सरकार के सबसे मजबूत पक्षकार बनकर खड़े हो जाते हैं। वे सरकार की गलतियों पर भी बोलते हैं और सरकार का पक्ष भी उतनी ही मजबूती से रखते हैं। शायद यही कारण है कि विपक्ष भी उन्हें पूरी तरह अपना नहीं मान पाता और सत्ता पक्ष भी उन्हें केवल औपचारिक समर्थक नहीं मान सकता।
उनकी भूमिका को यदि एक उदाहरण से समझना हो, तो वह किसी परिवार के बड़े भाई जैसी है। बड़ा भाई अपने छोटे भाई की गलती पर सबसे पहले उसी को डांटता है, उसकी कमियां गिनाता है और उसे सुधारने की कोशिश करता है। लेकिन यदि बाहर का कोई व्यक्ति उसी छोटे भाई का अपमान करने लगे, तो सबसे पहले वही बड़ा भाई उसके सामने खड़ा हो जाता है। विधानसभा में अजय चंद्राकर की भूमिका भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। अपनी सरकार की जवाबदेही तय करना वे अपना अधिकार भी मानते हैं और जिम्मेदारी भी। लेकिन सरकार की गरिमा पर बिना आधार के हमला हो, तो उसका प्रतिवाद करना भी उतनी ही मजबूती से जानते हैं।
आज की राजनीति में यह शैली कम दिखाई देती है। अधिकांश सत्ता पक्ष के विधायक सरकार का हर हाल में बचाव करते नजर आते हैं और अधिकांश विपक्ष हर निर्णय का विरोध करता है। लेकिन अजय चंद्राकर इन दोनों ध्रुवों के बीच एक अलग राजनीतिक शैली प्रस्तुत करते हैं। वे न तो अंध समर्थन के पक्षधर दिखते हैं और न ही केवल विरोध के लिए विरोध करने में विश्वास रखते हैं। सदन में उनका हर हस्तक्षेप यह संदेश देता है कि सरकार की मजबूती केवल बहुमत से नहीं, बल्कि जवाबदेही से भी तय होती है।
यही कारण है कि विधानसभा में उनके बोलने के दौरान सत्ता पक्ष के मंत्री भी पूरी गंभीरता से सुनते हैं। उन्हें पता होता है कि सवाल केवल राजनीतिक नहीं होंगे, बल्कि विभागीय तैयारी, प्रशासनिक दक्षता और निर्णयों की गुणवत्ता की भी परीक्षा होगी। दूसरी ओर विपक्ष भी ध्यान से सुनता है, क्योंकि कई बार जिन मुद्दों को वह उठाना चाहता है, उन्हें अजय चंद्राकर पहले ही सदन में उठा चुके होते हैं। लेकिन यदि विपक्ष तथ्यों से भटक जाए, तो सबसे पहले उसी का जवाब भी अजय चंद्राकर देते हैं।
इस बार भाजपा ने उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान नहीं दिया। इसके पीछे पार्टी की अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक सोच हो सकती है। लेकिन विधानसभा की कार्यवाही देखने वालों के बीच एक धारणा अवश्य बनती है कि बिना मंत्री बने भी उनका प्रभाव कई मंत्रियों से कम नहीं दिखता। सदन में उनकी तैयारी, विषयों पर पकड़ और बेबाक सवाल उन्हें अलग पहचान देते हैं।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत केवल मजबूत विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर मौजूद आत्ममंथन की संस्कृति भी होती है। जब सत्ता में बैठे लोग ही अपनी सरकार से कठिन सवाल पूछते हैं, तब शासन अधिक जवाबदेह बनता है। अजय चंद्राकर की शैली इसी लोकतांत्रिक परंपरा की याद दिलाती है। शायद यही कारण है कि उन्हें केवल भाजपा का वरिष्ठ विधायक कहना पर्याप्त नहीं होगा। विधानसभा में उनकी भूमिका कई बार ऐसी दिखाई देती है, जहां वे सत्ता पक्ष में रहकर भी विपक्ष की जिम्मेदारी निभाते हैं और जरूरत पड़ने पर विपक्ष को भी उसकी सीमाएं याद दिला देते हैं। यही संतुलन उन्हें छत्तीसगढ़ की राजनीति के सबसे अलग और प्रभावशाली नेताओं की श्रेणी में खड़ा करता है।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)