Monday | Sep 07, 2026
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कांवड़ उठाने पर सवाल क्यों, जब संदेश बराबरी का है?

जिस समाज ने कभी भेदभाव का दर्द झेला था, आज उसी समाज के धर्मगुरु कांवड़ लेकर शिव मंदिर पहुंच रहे है और सभी समाजों के साथ में बैठकर पूजा कर रहे है। यह सिर्फ एक धार्मिक दृश्य नहीं है बल्कि यह बाबा घासीदास के ‘मनखे-मनखे एक समान’ कि सफलता का प्रतीक है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बराबरी की यह तस्वीर भी कुछ लोगों को रास नहीं आ रही है।

रायपुर/ गुरु खुशवंत साहेब के कांवड़ यात्रा निकालने को लेकर सतनामी समाज के कुछ लोगों की नाराजगी सामने आ रही है। लेकिन इस पूरे प्रसंग को सिर्फ धार्मिक नजरिए से देखने के बजाय बाबा घासीदास के विचारों की रोशनी में देखने की जरूरत है। गुरु खुशवंत साहेब कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, वे बाबा घासीदास के वंशज हैं, मैकेनिकल इंजीनियर हैं और आज छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री होने के साथ सतनामी समाज के धर्मगुरु भी हैं।
सतनामी समाज का उदय ही सामाजिक कुरीतियों, छुआछूत और जातिगत भेदभाव के विरोध से हुआ। बाबा घासीदास ने मांसाहार और नशे का विरोध किया, जात-पात की दीवारों को नकारा और सबसे बड़ा संदेश दिया “मनखे-मनखे एक समान।” फिर आज अगर उसी समाज का कोई धर्मगुरु सावन में कांवड़ लेकर भगवान शिव के मंदिर जाता है, वहां पूजा करता है और दूसरे समाज के लोगों के साथ बराबरी से खड़ा होता है तो यह खुशी कि बात है पर कुछ लोगों का विरोध समझ से परे है। यह बात भी सही है कि बाबा घासीदास ने मूर्ति पूजा पर आपत्ति जताई थी परंतु यह बात भी सत्य है कि उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि ऐसा कोई कार्य व्यक्ति न करें जिससे किसी की भावना आहत हो साथ ही उन्होंने सभी के पूजा पद्धति के सम्मान की बात भी कही थी।

कभी यह शिकायत रही कि दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता, उन्हें बराबरी से बैठने नहीं दिया जाता, धार्मिक स्थलों पर उनके साथ भेदभाव होता है। आज अगर वही दरवाजे खुले हैं, सतनामी समाज के लोग मंदिरों में जाकर पूजा कर रहे हैं, ब्राह्मणों और दूसरे समाज के लोगों के साथ एक साथ बैठ रहे हैं, धार्मिक आयोजन में सहभागी बन रहे हैं तो यह बदलाव कोई छोटी बात नहीं है। यह उस सामाजिक बराबरी की दिशा में कदम है जिसकी कल्पना बाबा घासीदास ने की थी।
समाज अगर आगे बढ़ता है तो उसे अपनी पुरानी दीवारों को पीछे छोड़ना होगा जिन्होंने समाज को बांटा है।
भारत का समाज सदियों से अनेक परंपराओं और आस्थाओं से मिलकर बना है। समय और परिस्थितियों के साथ समाज में जो भेदभाव था, अगर वह कम हो रहा है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
हमें यह नहीं कहना चाहिए कि जिन चीजों से कभी हमें दूर रखा गया, अब हम भी उनसे दूर ही रहेंगे। बल्कि सोच यह होनी चाहिए कि अब किसी को किसी से दूर नहीं रखा जाएगा। यही तो “मनखे-मनखे एक समान” की वास्तविक भावना है। इसलिए मैं गुरु खुशवंत साहेब की सावन की कांवड़ यात्रा का अभिनंदन करता हूं। छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज एक ऐसा युवा धर्मगुरु मौजूद है जो बाबा घासीदास की विरासत को सिर्फ स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और बराबरी के संदेश के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
कांवड़ यात्रा को सिर्फ पूजा-पाठ का आयोजन मानकर उसकी आलोचना करने के बजाय अगर इसे सामाजिक दूरी कम करने, संवाद बढ़ाने और बराबरी की भावना मजबूत करने की पहल के रूप में देखा जाए तो शायद तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देगी।
सतनामी समाज के भाइयों से मेरा आग्रह है कि इस पहल को सकारात्मक दृष्टि से देखें। बाबा घासीदास ने समाज को दीवारों में बंद रहने का संदेश नहीं दिया था। उन्होंने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का संदेश दिया था। अगर आज वे दीवारें टूट रही हैं, तो इसका स्वागत होना चाहिए। मनखे-मनखे एक समान यही विचार आगे बढ़े, यही समाज की असली जीत है।

@देवेंद्र किशोर गुप्ता


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