Monday | Sep 07, 2026
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10 साल की उम्र में पिता का साया छूटा, संघर्षों ने संभाला…आज वही बेटा संभाल रहा है छत्तीसगढ़।

रायपुर/ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को अक्सर लोग उनकी सहजता, कम बोलने की आदत और शांत स्वभाव के कारण जानते हैं। लेकिन एक कार्यक्रम के मंच पर जब उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों की कहानी स्वयं सुनाई, तो शायद वहां मौजूद लोगों ने उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष देखा, जो शब्दों से अधिक दिल को छूने वाला था।

उन्होंने बताया कि जब वे केवल 10 वर्ष के थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया। जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते और निश्चिंत होकर बचपन जीते हैं, उस उम्र में विष्णुदेव साय को संघर्ष और जिम्मेदारियों का अर्थ समझना पड़ा। परिवार में बड़े होने के कारण विधवा मां, दादी, छोटे भाइयों और खेती-किसानी की जिम्मेदारियों का एहसास बहुत जल्दी हो गया। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ परिवार को संभालना और भाइयों की पढ़ाई की चिंता करना उनके जीवन का हिस्सा बन गया। स्वयं विष्णुदेव साय ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि पिता के निधन के बाद उन्हें बचपन जीने का अवसर बहुत कम मिला और परिवार की जिम्मेदारियां जल्दी संभालनी पड़ीं।

शायद यही संघर्ष था जिसने उनके भीतर सेवा का संस्कार और जिम्मेदारी का भाव पैदा किया। राजनीति उनके लिए अचानक मिली कोई चमक नहीं थी, बल्कि गांव की मिट्टी से शुरू हुई एक लंबी यात्रा थी। बगिया गांव के पंच से शुरू हुआ यह सफर सरपंच, अविभाजित मध्यप्रदेश के विधायक, चार बार लोकसभा सांसद, केंद्र में मंत्री पश्चात आज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री तक पहुंचा। उनका राजनीतिक जीवन वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की उस ताकत का उदाहरण है, जहां गांव की चौपाल से निकला व्यक्ति राज्य की सर्वोच्च जिम्मेदारी तक पहुंच सकता है।

लेकिन इस पूरे सफर की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद उनके पदों की लंबी सूची नहीं है। असली बात यह है कि इतने बड़े पदों तक पहुंचने के बाद भी उनके व्यक्तित्व में सहजता और विनम्रता दिखाई देती है। राजनीति में अक्सर ऊंचे पद के साथ व्यक्ति के व्यवहार में भी परिवर्तन देखा जाता है। लोग अपने पद, सुरक्षा घेरे और प्रभाव के साथ हवा में उड़ने लगते हैं। लेकिन विष्णुदेव साय को देखकर लगता है कि संघर्षों ने उन्हें ऊंचाईयां तो दी, मगर जमीन से अलग नहीं होने दिया।

उनकी विनम्रता शायद किसी राजनीतिक रणनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि जीवन के उन दिनों की देन है जब जिम्मेदारियां उम्र से कहीं बड़ी थीं। जिसने बचपन में मां की चिंता देखी हो, खेत में पसीना बहाया हो और छोटे भाइयों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाई हो, वह शायद सत्ता को भी जीवन की उपलब्धि से अधिक जिम्मेदारी के रूप में देखता है।

उस कार्यक्रम में जब मुख्यमंत्री अपने जीवन के इन्हीं पन्नों को खोल रहे थे, तो हॉल का शांत हो जाना भी स्वाभाविक था। क्योंकि मंच पर एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि संघर्षों से लड़कर आगे बढ़ा एक इंसान बोल रहा था। और जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की सच्चाई पूरी सहजता से कहता है, तो शब्द केवल कानों तक नहीं पहुंचते, वे सीधे दिल को छूते हैं। शायद यही कारण था कि वहां मौजूद कई लोगों की आंखें नम हो गईं।

आज के दौर में विष्णुदेव साय का व्यक्तित्व इस बात की याद दिलाता है कि बड़ा पद व्यक्ति को बड़ा नहीं बनाता, बल्कि संघर्षों को याद रखने और लोगों के बीच बने रहने की क्षमता उसे वास्तव में बड़ा बनाती है।

बगिया के एक साधारण किसान परिवार से निकला वह बालक, जिसने 10 वर्ष की उम्र में जीवन का कठिन पक्ष देख लिया था, आज छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री है। लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी पहचान मुख्यमंत्री होना भी नहीं है। उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इतनी लंबी राजनीतिक यात्रा और इतने बड़े दायित्व के बाद भी उनके भीतर वही सहज, सरल और जमीन से जुड़ा हुआ व्यक्तित्व दिखाई देता है।

असल में, विष्णुदेव साय की जीवनगाथा केवल पंच से मुख्यमंत्री बनने तक की यात्रा नहीं है। यह उस मिट्टी की कहानी है, जहाँ संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया, संस्कारों ने विनम्र रखा, जिम्मेदारियों ने उन्हें नेतृत्व करना सिखाया और साधारण जीवन ने उन्हें असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया।

(देवेंद्र किशोर गुप्ता)


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