Rawfile/ पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी टकराव के बीच ईरान लगभग अकेला दिखाई दे रहा है। हैरानी की बात यह है कि उसके सबसे बड़े सहयोगी माने जाने वाले रूस और चीन भी खुलकर उसके समर्थन में नहीं उतरे हैं और दूरी बनाए हुए हैं।
हालांकि दोनों देशों ने ईरान पर हुए हमलों की आलोचना की है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग भी की है, लेकिन अब तक सैन्य मदद देने से परहेज किया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके पीछे कई रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं।
1. रूस सीधे युद्ध में कूदने से बच रहा
रूस और ईरान के संबंध काफी मजबूत माने जाते हैं। दोनों देशों ने 2025 में रणनीतिक साझेदारी का समझौता भी किया था। लेकिन यह समझौता सैन्य गठबंधन नहीं है। ऐसे में रूस पर ईरान की रक्षा करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं बनती। फिलहाल रूस खुद को सीधे युद्ध में शामिल करने के बजाय मध्यस्थ की भूमिका में दिखाने की कोशिश कर रहा है।
2. चीन अपने आर्थिक हितों को लेकर सतर्क
चीन ईरान का बड़ा तेल खरीदार है, लेकिन उसके सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के साथ भी मजबूत आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में बीजिंग किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करके अपने व्यापक आर्थिक हितों को खतरे में नहीं डालना चाहता।
3. पश्चिम एशिया में संतुलन की रणनीति
रूस और चीन दोनों ही पश्चिम एशिया में संतुलित कूटनीति अपनाना चाहते हैं। वे ईरान के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन साथ ही क्षेत्र के अन्य प्रभावशाली देशों को भी नाराज नहीं करना चाहते। इसलिए दोनों देश फिलहाल बयानबाजी और कूटनीतिक स्तर तक ही सीमित हैं।
4. अमेरिका से सीधे टकराव का जोखिम
अगर रूस या चीन ईरान को खुलकर सैन्य मदद देते हैं तो इससे अमेरिका के साथ सीधा वैश्विक टकराव हो सकता है। यही वजह है कि दोनों देश फिलहाल सावधानी बरत रहे हैं और सीधे हस्तक्षेप से बच रहे हैं।
रूस ने कहा- ईरान ने हथियार नहीं मांगे
रूस ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि ईरान की ओर से युद्ध में किसी तरह के हथियार भेजने का अनुरोध नहीं किया गया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता के मुताबिक इस संबंध में तेहरान की तरफ से कोई आधिकारिक मांग नहीं आई है। वहीं रूस ने अमेरिका और इजरायल पर आरोप लगाया कि उनके हमलों से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ रहा है और अन्य अरब देशों को भी युद्ध में खींचने की कोशिश हो रही है।
ड्रोन को लेकर यूक्रेन की पेशकश
इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिका और पश्चिम एशिया के कई सहयोगी देश ईरान के ड्रोन का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन के अनुभव में रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने कई देशों से संभावित सहयोग को लेकर बातचीत भी की है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि यह सहयोग तभी संभव होगा जब इससे यूक्रेन की अपनी सुरक्षा प्रभावित न हो।
चीन के विशेषज्ञ की राय
चीन की विदेश नीति विशेषज्ञ युन सुन का कहना है कि ईरान में मौजूदा हालात के बाद जो भी नेतृत्व उभरकर आएगा, चीन उसके साथ काम करने को तैयार रहेगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि तेल आपूर्ति और साझा आर्थिक हित सुरक्षित रहें।
अगर लंबे समय तक संघर्ष चलता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो चीन अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर सकता है।