आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि विचारधाराओं के स्तर पर भी लड़े जा रहे हैं। अमेरिका, ईरान, इज़राइल और पश्चिम एशिया के हालात को समझने के लिए केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक तस्वीर को देखना जरूरी है।
पिछले कई वर्षों में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और पश्चिमी देशों के कई नेता खुलकर “इस्लामिक आतंकवाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। उनका तर्क यह रहा है कि कुछ कट्टरपंथी संगठन धर्म के नाम पर हिंसा और आतंक को बढ़ावा देते हैं। जिससे वैश्विक सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा है। यह शब्दावली अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। चाहे उससे आपकी हमारी सहमति हो या असहमति।
सच्चाई यह भी है कि दुनिया के कई संघर्षों में धार्मिक कट्टरता और उग्रवाद की भूमिका रही है। जब कोई विचारधारा संवाद छोड़कर हथियार उठा लेती है, तब उसका असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया उसकी कीमत चुकाती है। यही कारण है कि वैश्विक शक्तियाँ इसे सुरक्षा के नजरिए से देखती हैं और अपनी रणनीतियाँ उसी आधार पर तय करती हैं।
आज अमेरिका के हमले में मारे गए ईरान के मुखिया आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामनेई को लेकर भी दुनिया में तीखी राय रही है। उनके समर्थक उन्हें वैचारिक नेतृत्व का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें कठोर धार्मिक राजनीति का चेहरा मानते रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर सिर्फ धर्म की वजह से उनका भारत विरोधी रुख भारत के लोगों के लिए असहज रहा यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है। इसलिए उनके व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ स्वाभाविक हैं।
लेकिन यहां एक बड़ा सच यह भी है कि विश्व राजनीति केवल सिद्धांतों से नहीं चलती, बल्कि हितों से चलती है। अमेरिका हो या कोई और ताकतवर देश। हर कोई अपनी रणनीति, सुरक्षा और प्रभाव को मजबूत करने के लिए फैसले लेता है। कई बार देशों के बीच टकराव वैचारिक दिखते हैं, जबकि अंदर से वे भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों से संचालित होते हैं।
आज की दुनिया में यह भी साफ दिख रहा है कि जो देश कट्टरता से दूर रहकर विकास, आधुनिकता और आर्थिक सहयोग की दिशा में बढ़े, वे ज्यादा स्थिर और संपन्न बने। वहीं जहां विचारधारात्मक कठोरता हावी रही, वहां आंतरिक संघर्ष और अस्थिरता बढ़ी। यह केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि वैश्विक अनुभव की बात है।
भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में अलग और महत्वपूर्ण है। भारत के ईरान से ऐतिहासिक और व्यापारिक संबंध हैं, वहीं अमेरिका और पश्चिमी देशों से भी रणनीतिक साझेदारी है। इसलिए भारत का संतुलित और संयमित रुख कूटनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि परिपक्व नीति है। हर मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देना ही राष्ट्रहित नहीं होता। कई बार चुप रहकर हालात को समझना ज्यादा समझदारी होती है।
आज सोशल मीडिया के दौर में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग आधी जानकारी के आधार पर पक्ष या विपक्ष तय कर लेते हैं। समाज को आईना दिखाने का मतलब यह नहीं कि हम किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ खड़े हो जाएँ, बल्कि यह समझना है कि कट्टरता, हिंसा और राजनीतिक खेल इन तीनों के बीच फर्क क्या है। इस फर्क को खुला और साफ साफ लिखने में मै खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहा हूं।
खैर, दुनिया बदल रही है, समीकरण बदल रहे हैं। ऐसे समय में भारत के लोगों को भावनाओं से नहीं, बल्कि समझ और विवेक से प्रतिक्रिया देनी होगी। सच यही है राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, केवल हित होते हैं। और राष्ट्र वही मजबूत होता है जो भावनाओं से नहीं, समझदारी से निर्णय लेता है।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)