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प्रेस फ्रीडम इंडेक्स: भारत को बदनाम करने का एकतरफा नैरेटिव?

दिल्ली/ हर साल कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं दुनिया भर के देशों को लेकर अलग-अलग इंडेक्स जारी करती हैं। कभी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, कभी हंगर इंडेक्स, कभी डेमोक्रेसी इंडेक्स। इन रिपोर्टों को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो यही अंतिम सत्य हो। लेकिन सवाल यह है कि इन रैंकिंग्स का आधार क्या है? इनके मानदंड कौन तय करता है? और क्या वास्तव में ये भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर दिखाते हैं?

भारत को प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 157वें स्थान पर रखना केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि को धूमिल करने का प्रयास प्रतीत होता है। जिस देश में हर दिन हजारों अखबार प्रकाशित होते हों, सैकड़ों न्यूज चैनल सरकार की आलोचना करते हों, सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक पर खुलकर टिप्पणी होती हो, वहां प्रेस की आज़ादी नहीं है यह दावा अपने आप में हास्यास्पद लगता है।

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की आत्मा में बसती है। यहां आम नागरिक से लेकर पत्रकार तक सत्ता पर सवाल उठा सकता है। संसद से सड़क तक बहस होती है। टीवी डिबेट में सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाता है। सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं। अगर वास्तव में प्रेस स्वतंत्र नहीं होता, तो क्या यह सब संभव होता?

भारत के इतिहास में केवल आपातकाल का दौर ऐसा था जब प्रेस पर खुला प्रतिबंध लगा। उस समय अखबारों की हेडलाइन तक सेंसर होती थी। लेकिन आपातकाल समाप्त होने के बाद भारत ने फिर साबित किया कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसकी मूल चेतना है। उसके बाद आज तक ऐसा कोई कालखंड नहीं आया जब पूरे देश में प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त हुई हो।

दरअसल, समस्या यह है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं “पूर्ण अराजकता” को ही स्वतंत्रता मान लेती हैं। भारत में अगर कोई व्यक्ति मीडिया या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देशविरोधी गतिविधियां करे, हिंसा भड़काए, फर्जी खबर फैलाए, संविधान विरोधी प्रचार करे या कानून तोड़े, तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है। कानून का पालन करवाना प्रेस पर हमला नहीं कहलाता।

विडंबना यह भी है कि जिन देशों में तानाशाही की खुली व्यवस्था है, जहां सरकार के खिलाफ बोलने पर जेल या मौत तक का खतरा रहता है, वे कई बार इन इंडेक्स में भारत से बेहतर दिखाए जाते हैं। इसी तरह हंगर इंडेक्स में भी ऐसे देश भारत से ऊपर दिखते हैं जहां भुखमरी और गृहयुद्ध की भयावह स्थिति है। इससे इन सूचकांकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि 140 करोड़ लोगों वाला विविधताओं से भरा लोकतंत्र है। यहां हर विचार को जगह मिलती है। यही कारण है कि सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थान भी खुलेआम काम कर रहे हैं। सही मायने में यही लोकतंत्र की असली पहचान है।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि भारत खुद को विदेशी प्रमाणपत्रों से आंकना बंद करे। देश की लोकतांत्रिक शक्ति का प्रमाण किसी विदेशी संस्था की रैंकिंग नहीं, बल्कि भारत की जीवंत बहसें, सक्रिय मीडिया और जागरूक जनता है। प्रेस की स्वतंत्रता भारत में केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा है।

@देवेंद्र किशोर गुप्ता


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