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ऑडिट से पहले ‘आग का खेल’ आबकारी विभाग में क्या सच जलाया गया?

Raw File | 08 Feb 2026 | छत्तीसगढ़

आगजनी की घटना मात्र संयोग या प्रयोग

रायपुर/रॉ फाइल ब्यूरो/ राजधानी रायपुर के लाभांडी स्थित आबकारी भवन में शनिवार–रविवार की दरमियानी रात लगी आग ने छत्तीसगढ़ की सबसे अहम राजस्व एजेंसी छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन को लेकर बड़े और असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस तीसरी मंज़िल पर यह आग लगी, वहीं उस कॉरपोरेशन का दफ्तर है, जहां सरकारी शराब की खरीदी–बिक्री से जुड़ा पूरा लेखा-जोखा और इस साल की बिक्री से संबंधित अहम फाइलें रखी गई थीं। संयोग या साजिश है कि आग ठीक उसी वक्त लगी, जब सोमवार से ऑडिट शुरू होना था। आग में वे कागजात जलकर राख हो गए जिनके आधार पर ऑडिट होना था। और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब रिकॉर्ड ही नहीं बचे, तो ऑडिट आखिर किस आधार पर होगा।
जानकारी के मुताबिक रात करीब 9 बजे आबकारी भवन की तीसरी मंज़िल से धुआं और आग की लपटें दिखाई दीं। फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई और आग बुझाने में आधी रात लग गई। लेकिन तब तक हॉलनुमा कमरे में रखी फाइलें और दस्तावेज पूरी तरह जल चुके थे। आज भी दूसरे और तीसरे माले की आग के काले निशान सड़क से साफ दिखाई देते हैं, इसके बावजूद आबकारी विभाग के अफसरों की चुप्पी रहस्य को और गहरा करती है। हैरानी की बात यह है कि आग लगने की औपचारिक सूचना पुलिस तक नहीं पहुंची थी, या यूं कहें कि पहुंचाई ही नहीं गई। यह लापरवाही है या जानबूझकर उठाया गया कदम यह सवाल भी अपने आप में गंभीर है।

आबकारी विभाग से राज्य को राजस्व का एक बड़ा हिस्सा मिलता है। सरकारी शराब की खरीदी, भंडारण और बिक्री का पूरा तंत्र इसी कॉरपोरेशन के जरिए चलता है। ऐसे में रिकॉर्ड का नष्ट होना केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और संभावित जांचों पर सीधा प्रहार है।

उठती रही थी बेवरेज कार्पोरेशन में गड़बड़ी की बातें

सूत्रों का दावा है कि शुरुआती दो वर्षों में आबकारी व्यवस्था के भीतर भारी गड़बड़ियां हुईं, जमकर “काला-पीला” चला और सत्ता व संगठन से जुड़े कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर भीतरखाने सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में ऑडिट से ठीक पहले आग लगना महज़ इत्तेफाक मान लिया जाए, यह बात हजम नहीं होती।

भाजपा सरकार बनने के बाद लंबे समय तक स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ब्रेवरेज कार्पोरेशन की अध्यक्षता करते रहे। कुछ ही महीने पहले श्रीनिवास राव मद्दी को कॉरपोरेशन का नया अध्यक्ष बनाया गया। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या नेतृत्व परिवर्तन के बाद पुराने रिकॉर्ड और लेन-देन का ऑडिट किसी के लिए असहज होने वाला था। क्या इसी आशंका के बीच वे दस्तावेज आग की भेंट चढ़ गए, जिनसे कई परतें खुल सकती थीं।

स्कूल शिक्षा विभाग के दफ्तर में भी लगी थी आग 

यह पहला मौका नहीं है जब किसी अहम सरकारी दफ्तर में आग लगने की घटना सामने आई हो। हाल ही में स्कूल शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ के कार्यालय में भी आग लगने की घटना ने कई सवाल खड़े किए थे। ऐसे में यह सवाल और ज्यादा तीखा हो जाता है कि आखिर सरकारी दफ्तरों में आगजनी की घटनाएं लगातार क्यों बढ़ रही हैं। क्या यह महज़ सुरक्षा मानकों की अनदेखी है या फिर जांच, ऑडिट और जवाबदेही से बचने का एक सुविधाजनक तरीका बनता जा रहा है।

लंबी है सवालों की फेहरिस्त

अब सवालों की सूची लंबी है। आग लगने का असली कारण क्या था शॉर्ट सर्किट या कुछ? और फायर सेफ्टी ऑडिट कब हुआ था, उसकी रिपोर्ट क्या कहती है? जब रिकॉर्ड जल गए, तो क्या उनके डिजिटल बैकअप मौजूद थे? और अगर थे तो वे कहां हैं? पुलिस को अधिकृत सूचना क्यों नहीं दी गई और किसके निर्देश पर यह कदम उठाया गया। ऑडिट अब किन दस्तावेजों के आधार पर होगा और पिछले दो वर्षों की खरीदी-बिक्री, स्टॉक और टेंडर की जांच आखिर कैसे संभव होगी। आग से पहले या बाद में फाइलों की आवाजाही हुई या नहीं, और उस दौरान के सीसीटीवी फुटेज कहां हैं। ये सभी सवाल जवाब मांगते हैं।

आग आबकारी दफ्तर में लगी है धुआं सिस्टम से उठ रहा है!

यह मामला अब सिर्फ एक आग की घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के राजस्व, सिस्टम की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे से जुड़ा है। यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक था, तो विभागीय अफसर चुप क्यों हैं। और अगर कुछ छुपाने की कोशिश हुई है, तो आग लगने से पहले आखिर ऐसा क्या था, जिसे जल जाना “ज़रूरी” समझा गया। अब जरूरत है स्वतंत्र जांच, फॉरेंसिक ऑडिट और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की, क्योंकि बिना जवाबों के यह धुआं सिर्फ इमारत से नहीं, पूरे सिस्टम से उठता रहेगा।


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