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“हाशिये से दिल्ली तक: वरुण गांधी की प्रधानमंत्री से ‘मुलाकात’ के सियासी मायने”

BJP से टकराव, अब संवाद… कहानी में ट्विस्ट!

दिल्ली/ साल 2009 में वरुण गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और पीलीभीत से सांसद बनते ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गए। युवा चेहरा, गांधी परिवार का नाम और आक्रामक तेवर—इन तीनों का मेल उन्हें तेजी से भीड़ से अलग खड़ा कर रहा था। 2014 में उन्होंने सीट बदली और सुल्तानपुर से चुनाव लड़ा, जहां उन्होंने करीब पौने दो लाख वोटों से जीत हासिल की। यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि वरुण गांधी अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं।

लेकिन उनकी असली पहचान उनके बयानों से बनी। पीलीभीत में दिया गया उनका वह बयान जिसमें उन्होंने “गीता की कसम” खाकर हिंदुओं की रक्षा की बात कही थी ने उन्हें यूपी में हिंदुत्व के तेज और आक्रामक चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया। उस दौर में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई थी जो खुलकर बोलता है और अपने समर्थकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।

धीरे-धीरे यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि अगर 2017 में भाजपा उत्तर प्रदेश में सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वरुण गांधी बैठ सकते हैं। प्रयागराज समेत कई शहरों में उनके “भावी मुख्यमंत्री” के पोस्टर तक लगाए गए। यह उनके राजनीतिक कद का संकेत था।

लेकिन 2017 का चुनाव परिणाम आने के बाद कहानी अचानक बदल गई। भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला, लेकिन मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ। यहीं से वरुण गांधी की सियासत का ग्राफ नीचे की ओर जाता नजर आया। उसी समय पार्टी संगठन में भी बदलाव हुआ राजनाथ सिंह की जगह अमित शाह ने कमान संभाली। इसके बाद वरुण गांधी धीरे-धीरे पार्टी के केंद्र से दूर होते चले गए।

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल नहीं किया गया। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से भी उन्हें बाहर कर दिया गया। यह संकेत साफ था कि संगठन में उनकी भूमिका सीमित की जा रही है।

इसके बाद 2020 के बाद वरुण गांधी का रुख पूरी तरह बदला हुआ नजर आया। वे अपनी ही सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने लगे। किसानों के मुद्दे पर उन्होंने आवाज उठाई, बेरोजगारी को लेकर सवाल खड़े किए, और कई बार आर्थिक नीतियों की आलोचना भी की। उनके बयान सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल माने गए। यह एक असहज स्थिति थी—जहां एक ही पार्टी का सांसद अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर दिखाई दे रहा था।

समय बीतता गया और दूरी बढ़ती गई। आखिरकार 2024 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट ही काट दिया गया। यह एक बड़ा राजनीतिक झटका था। इससे साफ हो गया कि पार्टी और वरुण गांधी के रिश्ते लगभग टूट चुके हैं। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से कुछ हद तक दूर नजर आने लगे।

लेकिन राजनीति में ‘अंत’ जैसा कुछ नहीं होता। अब अचानक वरुण गांधी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। यह मुलाकात सामान्य नहीं मानी जा रही, क्योंकि इसके कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

क्या यह वापसी की शुरुआत है? क्या भाजपा एक बार फिर वरुण गांधी को मौका देने की सोच रही है?या फिर यह सिर्फ रिश्तों में आई कड़वाहट को कम करने की कोशिश है?

एक संभावना यह भी है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति को फिर से परिभाषित करना चाहते हों। वरुण गांधी का जनाधार, खासकर उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में, आज भी प्रभावी माना जाता है। वहीं भाजपा भी समय-समय पर अपने समीकरणों को साधने के लिए बड़े और चर्चित चेहरों को फिर से सक्रिय करती रही है।

कुल मिलाकर, यह मुलाकात कई सवाल छोड़ गई है, लेकिन एक बात तय है कि वरुण गांधी एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। और राजनीति में अक्सर वही नेता आगे बढ़ता है, जो चर्चा में बना रहता है। अब देखना होगा कि यह मुलाकात सिर्फ औपचारिकता साबित होती है या आने वाले समय में कोई बड़ा राजनीतिक संकेत देती है।


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