रायपुर ब्यूरो/ राजधानी में ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर हमें प्राप्त आंकड़े और पुलिस के मिल रहे निर्देश बेहद गंभीर स्थिति की ओर इशारा करते हैं। खबर के मुताबिक एक साल में 94 हजार ई-चालान जारी किए गए, लेकिन इनमें से 49 हजार चालान का जुर्माना अब तक जमा ही नहीं हुआ। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि यह बताता है कि मौजूदा व्यवस्था न तो जनता को सही ढंग से समझा पा रही है और न ही खुद प्रभावी तरीके से लागू हो पा रही है।
हमारे सूत्र बताते है कि 90 दिन के भीतर ई-चालान जमा नहीं करने पर मामला कोर्ट में जाएगा, साथ ही ड्राइविंग लाइसेंस, परमिट और बीमा तक निलंबित किए जा सकते हैं। यानी अब कार्रवाई सीधे आर्थिक दंड से आगे बढ़कर कानूनी और प्रशासनिक सजा तक पहुंच रही है। सवाल यह है कि क्या इतनी सख्ती से वाकई ट्रैफिक सुधरेगा, या फिर आम नागरिक और व्यवस्था के बीच टकराव और बढ़ेगा।
आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ कैमरों से चालानी कार्रवाई के मामलों में ही लगातार बढ़ोतरी हुई है।
जानकारी के मुताबिक 2021 में करीब 21,991 वाहन,
2022 में 32,871 वाहन, 2023 में 61,901 वाहन,
2024 में 54,689 वाहन और 2025 से अब तक 94,000 वाहन ई-चालान के दायरे में आ चुके हैं। इनसे 10.81 करोड़ रुपये का जुर्माना तय किया गया।लेकिन बड़ी रकम अब भी बकाया है।
यही नहीं, पुलिस के ही आंकड़े यह भी बताते हैं कि हर साल लगभग 40 प्रतिशत चालान लंबित रह जाते हैं।
नए नियम के अनुसार अब चौक-चौराहों पर खड़े होकर चालान की कार्रवाई नहीं होगी। यानी अब सिर्फ ई-चालान और कैमरों पर भरोसा किया जा रहा है। कई जगह कैमरे तो लगे हैं, लेकिन मौके पर ट्रैफिक पुलिस मौजूद नहीं है। ऐसे में न तो लोगों को तत्काल समझाइश मिलती है और न ही गलती सुधारने का मौका। नतीजा यह कि चालान तो कट जाता है, लेकिन सुधार नहीं होता।
ट्रैफिक एक्सपर्ट्स और पुलिस अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया जा रहा है कि तकनीक का उपयोग जरूरी है, लेकिन फील्ड पर जिम्मेदारी तय किए बिना सिर्फ कैमरे के भरोसे ट्रैफिक सुधारना संभव नहीं। यह भी साफ कहा गया है कि कार्रवाई का उद्देश्य राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि ट्रैफिक सुधार होना चाहिए।
इसी खबर के दूसरे पहलू में शहर के चौक-चौराहों की बदहाल स्थिति भी उजागर होती है। कई जगह ट्रैफिक सिग्नल स्पष्ट नहीं दिखते, कहीं बहुत नीचे हैं तो कहीं साइड में लगे हैं। अतिक्रमण की वजह से सड़कों की चौड़ाई कम हो चुकी है, जिससे ट्रैफिक का दबाव लगातार बना रहता है। ऐसे हालात में लोग जल्दबाजी में नियम तोड़ने को मजबूर हो जाते हैं और फिर सीधे चालान की कार्रवाई झेलते हैं।
रायपुर में दंडात्मक नीति न्यायसंगत नहीं!
रायपुर जैसे घनी आबादी वाले और बिखरे शहर में ट्रैफिक सुधार के लिए सिर्फ दंडात्मक नीति न्यायसंगत नहीं कही जा सकती। दिए गए निर्देश और आंकड़े खुद यह बताते हैं कि पहले व्यवस्था को दुरुस्त करना जरूरी है। पुलिस को नगर निगम और पीडब्ल्यूडी के साथ मिलकर अतिक्रमण हटाने, सड़कों को चौड़ा और व्यवस्थित करने, हर प्रमुख चौक पर ट्रैफिक पुलिस की तैनाती सुनिश्चित करने की जरूरत है।
जनहित की दृष्टि से सही रास्ता यही है कि पहले व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाए—ट्रैफिक नियमों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाया जाए, सिग्नल और सड़क व्यवस्था सुधारी जाए। उसके बाद यदि नियमों का उल्लंघन होता है, तो चालानी कार्रवाई को जनता भी स्वीकार करेगी। वरना सिर्फ आंकड़े बढ़ेंगे, जुर्माना बकाया रहेगा और ट्रैफिक की अव्यवस्था जस की तस बनी रहेगी।