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बस्तर में लोकतंत्र से हारा लाल आतंक -अमित शाह

दिल्ली/ लोकसभा में नक्सलवाद जैसे गंभीर और दशकों पुराने मुद्दे पर बोलते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक तरह से पूरे आंदोलन का इतिहास, राजनीति, विचारधारा और उसके अंत तक की कहानी देश के सामने रख दी। उनका साफ कहना था कि आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है और जो क्षेत्र कभी लाल आतंक की छाया में जीता था, वहां अब विकास की रोशनी पहुंच चुकी है। उन्होंने बताया कि बस्तर के गांव-गांव में स्कूल खोलने, राशन दुकानों के विस्तार, स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना और आधार व बैंकिंग सुविधाओं को पहुंचाने का काम तेज़ी से हुआ है। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आखिर 1970 से लेकर इतने वर्षों तक ये बुनियादी काम क्यों नहीं हो पाए।

गृह मंत्री ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के गरीबों को घर, गैस, शुद्ध पानी, स्वास्थ्य बीमा और मुफ्त अनाज जैसी सुविधाएं मिलीं, लेकिन बस्तर जैसे इलाके लंबे समय तक इनसे वंचित रहे। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उन्होंने नक्सलवाद को बताया, जिसकी वजह से विकास वहां पहुंच ही नहीं पाया। उनका कहना था कि जैसे-जैसे यह लाल साया हट रहा है, वैसे-वैसे बस्तर तेजी से विकास की मुख्यधारा में जुड़ रहा है और अब वहां भय नहीं बल्कि विश्वास का माहौल बन रहा है।

अमित शाह ने इस धारणा को भी खारिज किया कि नक्सलवाद गरीबी या विकास की कमी से पैदा हुआ। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि देश के कई ऐसे क्षेत्र थे जहां गरीबी और पिछड़ापन समान या उससे अधिक था, लेकिन वहां नक्सलवाद नहीं फैला। उनके अनुसार नक्सलवाद एक वैचारिक आंदोलन है, जो लोकतंत्र को नहीं मानता और सत्ता को बंदूक के बल पर हासिल करने में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर उन्हें हिंसा के रास्ते पर ले गई, जबकि भारत का मूल सिद्धांत “सत्यमेव जयते” है, जो सत्य और लोकतंत्र की ताकत पर विश्वास करता है।

अपने भाषण में उन्होंने उस दौर का भी जिक्र किया जब देश के 12 राज्यों में फैला रेड कॉरिडोर कानून व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। करोड़ों लोग वर्षों तक गरीबी और भय में जीते रहे और हजारों युवाओं ने अपनी जान गंवाई। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक सुरक्षा चुनौती नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक युद्ध था जिसमें निर्दोष नागरिक, जवान और आदिवासी सबसे ज्यादा पीड़ित हुए। उन्होंने यह भी बताया कि माओवादियों ने स्कूलों को जलाया, सड़कों को उड़ाया, बैंकिंग सुविधाओं को नष्ट किया ताकि लोग शिक्षित और आत्मनिर्भर न बन सकें और उनकी विचारधारा का प्रभाव बना रहे।

गृह मंत्री ने कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 60 वर्षों तक शासन करने के बावजूद आदिवासी क्षेत्रों तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचाई गईं, जिससे नक्सलवाद को पनपने का मौका मिला। साथ ही उन्होंने कुछ तथाकथित “अर्बन नक्सल” और एनजीओ नेटवर्क का जिक्र करते हुए कहा कि इन्होंने इस हिंसक विचारधारा को वैचारिक समर्थन देने का काम किया, जबकि इनकी संवेदनाएं कभी उन निर्दोष लोगों या शहीद जवानों के लिए नहीं दिखीं जो इस हिंसा का शिकार हुए।

अमित शाह ने बताया कि 2014 के बाद स्थिति में निर्णायक बदलाव आया, जब मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीति के साथ नक्सलवाद के खिलाफ व्यापक रणनीति बनाई गई। इसमें सुरक्षा और विकास दोनों को साथ लेकर चलने का मॉडल अपनाया गया। हजारों किलोमीटर सड़कें बनाई गईं, हजारों मोबाइल टावर लगाए गए, बैंक शाखाएं, एटीएम और डाकघर खोले गए, एकलव्य विद्यालय और कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया गया। उन्होंने कहा कि यह सब पहले इसलिए संभव नहीं था क्योंकि नक्सली इन विकास कार्यों को हिंसा के जरिए रोक देते थे, लेकिन अब उन्हें खत्म कर विकास का रास्ता साफ किया गया है।

उन्होंने सुरक्षा बलों की भूमिका को विशेष रूप से सराहा और कहा कि CAPF, CRPF, कोबरा, राज्य पुलिस और स्थानीय आदिवासियों के सहयोग से यह सफलता मिली है। आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन, सैटेलाइट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिसिस का उपयोग कर नक्सल नेटवर्क को तोड़ा गया। कई बड़े ऑपरेशनों के जरिए नक्सलियों के गढ़ ध्वस्त किए गए और उनके शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया गया। उन्होंने बताया कि हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, सैकड़ों मारे गए और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं, जिससे संगठन की रीढ़ टूट गई।

इस पूरे अभियान में छत्तीसगढ़ की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने केंद्र के साथ बेहतर समन्वय स्थापित किया और जमीनी स्तर पर रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू किया। वहीं उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने और ऑपरेशनों को तेज़ करने में अहम भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में सुरक्षा और विकास का संतुलन बनाते हुए बस्तर जैसे क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाने का काम तेज़ी से हुआ।

अंत में गृह मंत्री ने स्पष्ट कहा कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य लगभग पूरा हो चुका है और अब यह लड़ाई अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने इसे सिर्फ सुरक्षा बलों की जीत नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास और आदिवासी समाज के विश्वास की जीत बताया। उनका संदेश साफ था कि अब देश में बंदूक नहीं, बल्कि विकास और लोकतांत्रिक व्यवस्था ही भविष्य तय करेगी।


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