रायपुर ब्यूरो/ किसी भी सरकार की असली परीक्षा केवल घोषणाओं और योजनाओं से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह किस तरह के अधिकारियों को अपने सबसे महत्वपूर्ण विभागों में बनाए रखती है। छत्तीसगढ़ का लोक निर्माण विभाग ऐसा ही एक संवेदनशील विभाग है, जहां सड़क, पुल और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ सरकार की साख भी दांव पर रहती है। आज यही साख उस समय सवालों में घिरती दिख रही है, जब गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारी विभाग के प्रमुख अभियंता विजय कुमार भतपहरी का नाम बार-बार सामने आ रहा है। छत्तीसगढ़ के पूर्व गृह मंत्री ननकी राम कंवर ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और लोक निर्माण मंत्री छत्तीसगढ़ को पत्र लिखकर इनकी कथित करगुजारियों से अवगत कराया है और इन पर कार्रवाई करने की बात कही है। इस समाचार में श्री कंवर के पत्र और उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों को पढ़कर रॉ फाइल ने भी अपने समीक्षात्मक विचार रखे है।
प्रदेश सरकार और लोक निर्माण मंत्री अरुण साव को यह समझना होगा कि यह मुद्दा केवल आरोपों का नहीं है। यह वह मामला है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार भी कार्रवाई कर चुकी है। दस्तावेज़ी रिकॉर्ड बताते हैं कि भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते हुए इस अधिकारी पर लगे आरोपों को गंभीर मानते हुए उन्हें पद से हटा दिया था। यह तथ्य अपने-आप में यह संकेत देता है कि मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी इसे गंभीर माना गया।
यहीं से वर्तमान सरकार के लिए सवाल और गहरे हो जाते हैं। जब कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी इस अधिकारी को दंडित करना जरूरी समझा गया, तो आज भाजपा सरकार में उनके इर्द-गिर्द बने रहने से यह संदेश जाता है कि कहीं न कहीं सरकार अनचाहे ही एक ऐसे अधिकारी के कारण राजनीतिक जोखिम उठा रही है, जो पहले भी विवादों और कार्रवाइयों का सामना कर चुका है। 
राजनीतिक सच्चाई यह है कि अधिकारी कभी चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन उनके फैसलों और कथित कारनामों की कीमत हमेशा सरकार और मंत्री को चुकानी पड़ती है। लोक निर्माण विभाग में यदि चहेते ठेकेदारों, कथित वसुलीकर्ताओं और बंद कमरों में फैसले होने की चर्चा आम हो जाए, तो जनता यह नहीं देखती कि यह किस दौर की गलती है। सवाल सीधा सरकार की नीयत और नियंत्रण पर आता है। यही वजह है कि कहा जाता है—गलत अफसर, सही सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर देता है।
सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सरगुजा संभाग से लेकर मुख्यमंत्री के गृह जिले तक, कांग्रेस सरकार के दौरान जिन सड़कों और निर्माण कार्यों में घोटालों और घटिया निर्माण के आरोप लगे, उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी जिन अधिकारियों से जोड़ी गई, उनमें यही नाम प्रमुख रूप से चर्चा में रहा। आज यदि वही नाम फिर से व्यवस्था के आसपास दिखाई देता है, तो स्वाभाविक है कि जिम्मेदार नागरिक यह सवाल उठाए कि क्या सरकार ने पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लिया। 
लोक निर्माण मंत्री अरुण साव की छवि एक सख्त, ईमानदार और निर्णय लेने वाले मंत्री की रही है। लेकिन राजनीति में छवि उतनी ही मजबूत होती है, जितनी मजबूत आपकी टीम होती है। यदि विभाग में ऐसा अधिकारी बना रहता है, जिस पर न केवल आरोप हों, बल्कि जिसे पूर्व सरकार द्वारा दंडित भी किया जा चुका हो, तो यह मंत्री की मंशा पर नहीं, बल्कि उनके निर्णयों पर सवाल खड़े करता है। विपक्ष को इससे बड़ा मौका और क्या चाहिए।
यह लेख सरकार पर हमला करने के लिए नहीं, बल्कि उसे समय रहते आगाह करने के लिए है। सरकार के पास अब भी अवसर है कि वह साफ संदेश दे लोक निर्माण विभाग में दागी और विवादित छवि वाले अधिकारियों के लिए कोई जगह नहीं है। यदि कोई अधिकारी सरकार और मंत्री की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहा है, ठेकेदारों और कथित वसूली तंत्र के जरिए सिस्टम चला रहा है, तो उससे दूरी बनाना ही राजनीतिक और प्रशासनिक समझदारी है। 
अंततः सवाल यह नहीं है कि कौन-सी सरकार कब थी। सवाल यह है कि लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभाग में सरकार किस स्तर का नैतिक और प्रशासनिक मानदंड तय करना चाहती है। यदि अभी निर्णय नहीं लिया गया, तो यह मुद्दा केवल अफसरशाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राजनीतिक संकट बन सकता है।