छत्तीसगढ़ के दो मजदूर दीपक रात्रे और भूपेंद्र भैना अपने परिवार का पेट पालने घर से निकले थे। उन्हें क्या पता था कि उनकी आख़िरी पहचान उनका नाम या उनका काम नहीं, बल्कि उनका धर्म बना दिया जाएगा।
कट्टरवादी मुस्लिम आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा का मुखौटा कहलाने वाले टीआरएफ के आतंकवादियों ने भीड़ में उनका धर्म पूछा…और फिर गोली मार दी।
यह केवल दो निर्दोष मजदूरों की हत्या नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा पर हमला है। यह इंसानियत को चुनौती है। ऐसी घटना पर न कोई राजनीतिक चश्मा होना चाहिए, न वैचारिक सुविधा और न ही वोट बैंक की मजबूरी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हर भारतीय, हर सामाजिक संगठन, हर धर्मगुरु और हर राजनीतिक दल एक स्वर में इस बर्बरता की निंदा करे। आतंकवाद का समर्थन करने वाला, उसे सही ठहराने वाला या उस पर चुप रहने वाला तीनों समाज के लिए ख़तरनाक हैं।
याद रखिए, आतंकवाद का जवाब आतंकवाद नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकजुटता है। लेकिन एकजुटता तभी दिखेगी, जब हमारा विरोध भी बिना भेदभाव के होगा। निर्दोष की हत्या, निर्दोष की हत्या होती है चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या क्षेत्र का हो।
आज सवाल केवल उन आतंकवादियों से नहीं है जिन्होंने गोली चलाई बल्कि सवाल उन लोगों से भी है जो ऐसे अपराधों पर अपनी सुविधा के अनुसार बोलते हैं या चुप्पी साध लेते हैं।
आतंकियों की गोली दो लोगों की जान लेती है, लेकिन समाज की खामोशी आतंकवादियों का हौसला बढ़ाती है। इसलिए बोलिए… क्योंकि आतंकवाद पर मौन रहना, इंसानियत के खिलाफ खड़े होने जैसा है।