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शिक्षा के नाम पर आंदोलन, लेकिन निशाने पर हिंदू आस्था?

Raw File | 17 Jul 2026 | राष्ट्र

दिल्ली/ दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुग और अभिजीत दीपके के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर था। देश के बहुत से युवाओं ने सोचा कि यह आंदोलन शिक्षा, छात्रों के भविष्य और जवाबदेही की लड़ाई लड़ेगा। लेकिन जब उसी मंच से कुणाल कामरा ने “सीता के पति का नाम लेकर, नीता के पति का काम कर रहे हैं” जैसी टिप्पणी की है। ऐसे यह सवाल उठता है कि क्या शिक्षा के आंदोलन में भगवान श्रीराम और माता सीता पर टिप्पणी जरूरी थी?

पर बड़ी निराशा केवल इस टिप्पणी से नहीं हुई, बल्कि निराशा उस मंच से हुई जहां यह बात कही गई। यदि आंदोलन के आयोजक वास्तव में शिक्षा के मुद्दे पर गंभीर होते, तो उसी क्षण मंच से घोषणा करते कि “धार्मिक आस्थाओं पर टिप्पणी इस आंदोलन का हिस्सा नहीं है।” लेकिन ऐसी कोई स्पष्ट आपत्ति सामने नहीं आई। इससे विवाद और गहरा हो गया।

यही वह बिंदु है जहां आंदोलन अपनी नैतिक ऊंचाई खोता हुआ दिखाई देता है। जब मंच पर विवादित टिप्पणी हो और मंच का नेतृत्व उसे रोकता हुआ न दिखे, तो लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल शिक्षा का आंदोलन था या धीरे-धीरे सरकार विरोध के साथ हिंदू आस्था पर कटाक्ष का भी मंच बन गया?

सोनम वांगचुग और अभिजीत दीपके जैसे प्रमुख चेहरों से यह अपेक्षा थी कि वे तत्काल स्पष्ट करते कि आंदोलन किसी भी धर्म का अपमान स्वीकार नहीं करता। यदि ऐसा सार्वजनिक संदेश दिया जाता, तो शायद पूरा विवाद वहीं समाप्त हो जाता। लेकिन ऐसी स्पष्ट दूरी सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दी, इसलिए आंदोलन की दिशा पर प्रश्न उठ रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक और सवाल खड़ा किया है। जो लोग हर मंच पर स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं, वे इस टिप्पणी पर लगभग मौन क्यों रहे? यदि किसी अन्य धर्म के पूजनीय व्यक्तित्वों पर ऐसी टिप्पणी होती, तो क्या प्रतिक्रिया भी इतनी ही शांत रहती? क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल चुनिंदा मामलों में संवेदनशील होना है, या सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखना?

सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का अधिकार है। शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाइए, नीतियों का विरोध कीजिए, शिक्षा मंत्री से इस्तीफे की मांग कीजिए यह सब लोकतांत्रिक अधिकार हैं। लेकिन यदि आंदोलन के मंच से धार्मिक आस्थाओं पर कटाक्ष होने लगे और आयोजकों की ओर से उस पर स्पष्ट आपत्ति भी न आए, तो आंदोलन का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।

कोई भी आंदोलन तब मजबूत होते हैं जब वे अपने घोषित उद्देश्य पर टिके रहते हैं। लेकिन जब मंच पर शिक्षा से अधिक विवाद पैदा करने वाले बयान सुर्खियां बन जाएं, तो यह पूछना गलत नहीं कि आखिर आंदोलन का केंद्र क्या रह गया है शिक्षा सुधार या राजनीतिक और वैचारिक टकराव?

यदि आंदोलन वास्तव में शिक्षा के लिए है, तो उसे शिक्षा तक ही सीमित रहना चाहिए। किसी भी धर्म की आस्था को राजनीतिक व्यंग्य का माध्यम बनने देना न आंदोलन के हित में है, न लोकतांत्रिक संवाद के।

(देवेंद्र किशोर गुप्ता)


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