रायपुर/छत्तीसगढ़ में अमानक दवाओं का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। यहां सबसे शर्मनाक बात यह है कि यह सब स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की नाक के नीचे हो रहा है। मंत्री मंचों पर स्वास्थ्य सुधार के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन जमीन पर हालात यह हैं कि बच्चों तक को दी जाने वाली दवाएं अमानक निकल रही हैं।
ताजा मामला बच्चों को क्रीमी से बचने के लिए दी जाने वाली एल्बेंडाजोल के अमानक टैबलेट का है। जिसका उपयोग रायपुर, बलौदाबाजार के जिला अस्पताल व स्वास्थ्य केंद्रों में किया जा रहा था। जिस पर एक बार फिर रोक लगानी पड़ी। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर दवा घटिया थी तो खरीदी कैसे हुई? सप्लाई कैसे हुई? और इस्तेमाल कैसे शुरू हुआ? अब इसका जवाब अब मंत्री जी देंगे या फिर हमेशा की तरह कार्रवाई जारी है” कहकर ठंडे बस्ते में मामले को डाल दिया जाएगा? 
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस लिमिटेड (CGMSC) द्वारा दावा किया जाता है कि अस्पतालों में पहुंचने वाली दवाईयों में सब कुछ पारदर्शी है, जांच होती है, गुणवत्ता देखी जाती है। लेकिन बार-बार सामने आ रहे मामलों ने बता दिया कि CGMSC की यह व्यवस्था गुणवत्ता की नहीं, कमीशन और सेटिंग की मशीन बन चुकी है। स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल तथा CGMSC अध्यक्ष दीपक मस्के की कथनी और करनी में फर्क इतना बड़ा है कि जनता अब पूछ रही है क्या छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य विभाग मरीजों की जान बचाने के लिए चल रहा है या अमानक दवा सप्लायर्स को मोटी रकम कमवाने के लिए?
सबसे गंभीर बात यह है कि कार्रवाई हमेशा “रोक लगाने” तक सीमित रहती है। किस कंपनी ने सप्लाई की? किसने पास किया? किस अधिकारी ने रिसीव किया? किसके आदेश पर बांटा गया?इन सवालों पर विभाग की आवाज हमेशा कमजोर पड़ जाती है। क्योंकि सच्चाई सब जानते हैं यह पूरा खेल संरक्षण के बिना संभव नहीं। और यह पहली बार नहीं है, पिछले मामलों में भी यही पैटर्न रहा। दवा अमानक निकली, खबर बनी, कुछ दिन हंगामा हुआ, फिर मामला ठंडा… और अगले महीने नई अमानक दवा का नया प्रकरण!
अब जनता और डॉक्टर समुदाय का धैर्य जवाब दे रहा है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को यह बताना होगा कि उनके विभाग में असल नियंत्रण किसका है? स्वयं मंत्री का या उन अफसरों-ठेकेदारों का, जिनका कारोबार लोगों की सेहत से खेलकर ही चलता रहता है?
ऐसे में स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल की कथनी सिर्फ बयान बनकर रह गई है। जबकि सच्चाई यह है कि अमानक दवाओं का यह धंधा सरकार की कमजोरी ही नहीं, विभागीय भ्रष्टाचार का प्रमाण भी है।