रायपुर/ छत्तीसगढ़ की राजनीति में वर्ष 2017 का बहुचर्चित ‘अश्लील सीडी कांड’ एक बार फिर सुर्खियों में है और इसके साथ ही प्रदेश की राजनीति के उस काले अध्याय की चर्चा भी लौट आई है, जिसे आज भी लोग छत्तीसगढ़ की राजनीति की निम्नतम घटना के रूप में देखते हैं। यह केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं था, बल्कि किसी व्यक्ति के चरित्र हरण का सुनियोजित और अमानवीय प्रयास था, जो दुखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी। अब जब यह मामला फिर से अदालत के दरवाजे पर पूरी गंभीरता के साथ पहुंच चुका है, तो यह जरूरी हो जाता है कि सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे सत्य और जिम्मेदारी की भी स्पष्टता सामने आए।
रायपुर session court ने CBI की रिव्यू पिटिशन को मंजूर करते हुए लोअर कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को आरोपों से बरी कर दिया गया था। अब इस मामले में सभी आरोपियों के खिलाफ नियमित ट्रायल चलेगा और भूपेश बघेल को दोबारा कोर्ट में पेश होना होगा।इस फैसले से यह मामला एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।
यह पूरा विवाद अक्टूबर 2017 का है, जब तत्कालीन भाजपा सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे राजेश मूणत के खिलाफ कथित रूप से एक आपत्तिजनक सीडी सार्वजनिक हुई थी। इसे लेकर राजनीतिक भूचाल आया और प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप की आंधी चल पड़ी।
इस प्रकरण में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से पत्रकार तथा भूपेश बघेल के मीडिया सलाहकार रहे विनोद वर्मा को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का दावा था कि उनके पास से सीडी की 500 प्रतियां बरामद हुई थीं। बाद में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई और सीबीआई ने चार्जशीट में भूपेश बघेल सहित 6 लोगों को आरोपी बनाया। इस प्रकरण में कारोबारी कैलाश मुरारका, विनोद वर्मा, विजय भाटिया, विजय पाण्डेय और अन्य नाम भी सामने आए। वहीं, एक आरोपी द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना ने इस मामले को और अधिक गंभीर तथा संवेदनशील बना दिया।
लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और सबसे जरूरी सवाल आज भी वही है—सीडी किसने बनाई, किसके कहने पर बनाई और क्यों बनाई? यह सच सामने आना बेहद जरूरी है, क्योंकि फर्जी सेक्स सीडी बनाकर किसी के चरित्रहनन का मतलब केवल एक व्यक्ति पर आरोप लगाना नहीं होता, बल्कि उसके पूरे परिवार को शर्मसार करना होता है, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करना होता है और उसे अपमान तथा मानसिक यातना के लंबे दौर में धकेल देना होता है।
वह व्यक्ति और उसका परिवार उस समय कैसा महसूस करते रहे होंगे, इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता।
यह भी उतना ही गंभीर पहलू है कि सीडी की पड़ताल किए बगैर, उसकी पुष्टि किए बगैर, भूपेश बघेल द्वारा उसे पत्रकार वार्ता में लहराना और जनभावना को प्रभावित करने की कोशिश करना भी एक बड़ा अपराध है।
हम यह कतई नहीं कह रहे कि जिन पर आरोप लगे हैं वे ही अपराधी हैं, क्योंकि अपराध सिद्ध करना अदालत का काम है और न्याय का आधार सबूत होते हैं, भावनाएं नहीं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह जो कृत्य हुआ, वह अक्षम्य है। लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हो सकती है, लेकिन किसी का चरित्रहनन कर उसे खत्म करने की कोशिश करना राजनीतिक लड़ाई नहीं, सामाजिक अपराध है।
आज जब अदालत ने फिर से मुकदमा चलाने का रास्ता खोल दिया है, तो यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं रह जाती, बल्कि यह उस पूरी राजनीति के खिलाफ भी सवाल खड़ा करती है जो चरित्र को निशाना बनाकर सत्ता की लड़ाई लड़ती है।
ऐसे मामले छत्तीसगढ़ के राजनीतिक वातावरण को दूषित करते हैं और समाज में अविश्वास का जहर फैलाते हैं। इसलिए इस फैसले को केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक जरूरी अवसर माना जाना चाहिए ताकि पूरे प्रकरण की सच्चाई सामने आए, जिम्मेदारी तय हो और दोषियों को दंड मिले।
इस तरह के मामलों में अदालत की सख्ती और निष्पक्षता स्वागतेय है, क्योंकि यही न्याय भविष्य के लिए संदेश बनेगा कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में चरित्रहनन जैसे हथकंडों को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब जरूरत है कि इस प्रकरण में न्यायिक प्रक्रिया तेज, पारदर्शी और तथ्य आधारित तरीके से आगे बढ़े, ताकि सच सामने आए और प्रदेश की जनता को यह भरोसा मिल सके कि राजनीति के नाम पर किसी का सम्मान रौंदने वालों को आखिरकार जवाब देना ही पड़ेगा।