Monday | Apr 20, 2026
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दिल्ली में दिखा भरत मिलाप सा दृश्य!

जंबूरी से ‘जंग’ तक…फिर दिल्ली में ‘डिनर डिप्लोमेसी’!

देवेंद्र किशोर गुप्ता/दिल्ली/ छत्तीसगढ़ की राजनीति में उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है। यहां कभी मुद्दे गरम होते हैं, कभी रिश्ते, और कभी-कभी तो कुर्सी की लड़ाई में पूरा माहौल ही “कैंप” नहीं बल्कि “क्लेश” बन जाता है। बालोद में आयोजित रेंजर-रोवर जंबूरी भी कुछ ऐसा ही आयोजन रहा, जो स्काउट-गाइड की अनुशासित परंपरा और युवाओं के प्रशिक्षण के लिए होना था, मगर दुर्भाग्य से यह आयोजन व्यवस्था से ज्यादा भ्रष्टाचार, राजनीति और पद की खींचतान के कारण भारी विवादों में रहा। इस पूरे घटनाक्रम में रायपुर सांसद एवं पूर्व शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के बीच स्काउट-गाइड अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान खुलकर सामने आई। एक तरफ गजेंद्र यादव ने बृजमोहन अग्रवाल की जानकारी के बगैर अध्यक्ष पद पर कब्जा जमा लिया, तो दूसरी तरफ बृजमोहन अग्रवाल ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए न्यायालय का रुख कर लिया।
व्यावहारिक रूप से देखें तो स्काउट-गाइड जैसे संगठन का अध्यक्ष वर्तमान शिक्षा मंत्री को होना ही चाहिए, क्योंकि यह संगठन सीधे स्कूलों, बच्चों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लेकिन राजनीति में व्यावहारिकता हमेशा सिद्धांतों के आगे नहीं टिकती। सिद्धांतों की दृष्टि से पूर्व शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही अध्यक्ष थे और शायद इसी कारण यह मामला सिर्फ पद परिवर्तन का नहीं रहा बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई बन गया। असल विवाद इस बात का था कि यदि गजेंद्र यादव संवाद कर, जानकारी देकर और वरिष्ठ नेता की सहमति लेते हुए अध्यक्ष बनते तो यह विषय विवाद नहीं बनता। यहां “अध्यक्ष कौन” से ज्यादा “अध्यक्ष कैसे बना” बड़ी बात बन गई और राजनीति में कई बार रास्ता ही मंजिल से बड़ा हो जाता है।
इस पूरे विवाद के पीछे एक और बात भी मन में टीस बनकर रही होगी। कहा जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल इस जंबूरी आयोजन को नई राजधानी रायपुर में करवाना चाहते थे। उनका उद्देश्य केवल एक आयोजन भर नहीं था, बल्कि वे दुनिया को यह संदेश देना चाहते थे कि छत्तीसगढ़ सिर्फ नक्सलवाद के नाम से नहीं जाना जाए, बल्कि यह राज्य विकास के नए अध्याय में प्रवेश कर चुका है। नवा रायपुर का विकास, उसकी पहचान और राज्य की संभावनाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करने के लिए जंबूरी एक अच्छा अवसर बन सकता था। लेकिन गजेंद्र यादव ने बालोद में कैंप का आयोजन कर दिया और कहीं न कहीं यह बात बृजमोहन अग्रवाल को खटक गई। यही कारण रहा कि मामला धीरे-धीरे प्रशासनिक प्रक्रिया से निकलकर न्यायालय तक पहुंच गया। जंबूरी समाप्त हो चुका है, पर मामला अभी भी कोर्ट में है और आगे क्या होगा यह न्यायालय तय करेगा।
इन सब विवादों के बीच राजनीति का सबसे सुखद पक्ष आज दिल्ली की तस्वीर में देखने को मिला। छत्तीसगढ़ भाजपा प्रभारी नितिन नबीन के राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित कई मंत्री और सांसद दिल्ली पहुंचे थे। इसी दौरान रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के निवास पर छत्तीसगढ़ के विधायक-सांसद और नेताओं के लिए आयोजित डिनर कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव भी पहुंचे। वहां दोनों नेताओं को गले मिलते हुए और गुलाब भेंट करते हुए देखकर यह अच्छा लगा कि राजनीति में चाहे जितनी खींचतान हो, संबंधों की गरिमा सार्वजनिक रूप से टूटती हुई नहीं दिखनी चाहिए। आखिर राजनीति में पावर की लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन रिश्तों में कड़वाहट का प्रदर्शन करना और बात है। मतभेद और मनभेद के बीच बहुत बारीक फर्क होता है और परिपक्वता इसी में है कि मतभेद को मनभेद में बदलने न दिया जाए।वैसे भी रहीमदास जी ने कहा ही है “क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।”

वरिष्ठता और अनुभव का सम्मान भी राजनीति की संस्कृति है और जिम्मेदारी के पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर संवाद होता, गरिमा बनी रहती और निर्णय साझे में लिए जाते तो यह पूरा विवाद विवाद नहीं बनता। छत्तीसगढ़ की राजनीति को आज इसी संतुलन की जरूरत है, जहां मतभेद रहें तो भी मर्यादा बनी रहे, क्योंकि जनता आखिर में यह नहीं देखती कि अध्यक्ष कौन है, जनता यह देखती है कि संगठन सही चल रहा है या नहीं। आज की दिल्ली वाली तस्वीर यही संदेश देती है कि सत्ता बदलती रहती है, पद आते-जाते रहते हैं, पर राजनीति की असली जीत यही है कि रिश्ते, सम्मान और संयम बचा रहे।


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