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पिछले 1 साल से नहीं बन रहा बीज विक्रय का लाइसेंस, ऐसा है कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ राज्य का हाल।

Raw File | 21 Jan 2026 | छत्तीसगढ़, प्रदेश

रायपुर। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसानों और उद्यानिकी क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी बीज व्यवस्था विभागीय लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है, क्योंकि पिछले एक साल से राज्य में बीज विक्रय करने वाली कंपनियों को न तो नया लाइसेंस जारी हो पा रहा है और न ही पुराने लाइसेंस में किसी तरह का संशोधन संभव हो पा रहा है। जिसके चलते कृषि-उद्यानिकी विभाग में लाइसेंस वितरण और संशोधन का काम पूरी तरह धप्प पड़ा हुआ है।
जानकारी के मुताबिक संयुक्त संचालक उद्यानिकी रहे भूपेंद्र पांडे के सेवानिवृत्त होने के बाद विभाग द्वारा अब तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई और न ही किसी अधिकारी को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई। जिससे पूरी प्रणाली ठहर गई है और इसका सीधा नुकसान किसानों तथा प्रतिष्ठित बीज कंपनियों को उठाना पड़ रहा है। इन हालातों में कई अच्छी और प्रतिष्ठित बीज कंपनियां चाहकर भी फलों और सब्जियों के गुणवत्तापूर्ण बीज बाजार में नहीं भेज पा रही हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसी विभागीय शून्य और धीमी प्रक्रिया का फायदा उठाकर लाइसेंस के नाम पर केवल आवेदन भर देते हैं और धड़ल्ले से बाजार में बीज बेचने लगते है। जिससे अमानक बीज की बिक्री को बढ़ावा मिल रहा है और किसान ठगी व नुकसान के जोखिम में आ गया है।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि इन मामलों में विभाग का रवैया भी उदासीन बना हुआ है, न कोई गंभीर जांच-पड़ताल होती है और न ही अमानक बीज बेचने वालों पर सख्त कार्रवाई, जिससे नियमों का मजाक बन रहा है और किसान मजबूरी में वही बीज खरीदने को विवश हो रहे हैं।
इस पूरे मामले की जानकारी कृषि मंत्री रामविचार नेताम तथा कृषि सचिव शहला निगार को है इसके बावजूद उन्होंने एक साल बीत जाने के बाद भी समस्या के समाधान को लेकर ठोस पहल नहीं की गई। जबकि एक साल का समय कोई छोटी अवधि नहीं होती इसी दौरान फसलों के दो सीजन निकल जाते हैं और किसान की मेहनत, लागत और उत्पादन सब पर असर पड़ता है।
इस संबंध में हमने संचालक उद्यानिकी लोकेश कुमार से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि लाइसेंस जारी करने हेतु बीज प्रमाणीकरण अधिकारी के लिए विधि विभाग में पत्र भेजा गया है। हालांकि विभागीय जानकारी के अनुसार यह पत्र भेजे एक साल से अधिक समय गुजर चुका है और प्रक्रिया के अनुसार राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद ही जिम्मेदारी मिलती है। लेकिन सवाल यह है कि यदि कृषि प्रधान राज्य में एक पद की जिम्मेदारी तय करने और राजपत्रीय प्रक्रिया पूरी करने में भी साल भर से अधिक समय लग जाए तो किसानों के हितों की रक्षा और बाजार में गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी।

कुल मिलाकर यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ में कृषि-उद्यानिकी विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विभाग किसानों की तरक्की के बजाय उनकी बदहाली की दिशा में धकेल रहा है, क्योंकि सिस्टम के ठप होने का फायदा वे लोग उठा रहे हैं जो नियमों की परवाह किए बिना बीज बेच रहे हैं, जबकि नुकसान अंततः किसान को उठाना पड़ रहा है।


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