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स्मार्ट सिटी के बाद नया शहरी दांव: क्या इस बार दिखेगा असली बदलाव?

Raw File | 15 Feb 2026 | राष्ट्र, विचार

स्मार्ट सिटी के नाम पर काफी जगहों पर धन की बर्बादी देखी है ऐसे में ₹1 लाख करोड़ का नया शहरी दांव बेहद चुनौती पूर्ण होगा।

नई दिल्ली/रायपुर/ भारत सरकार ने हाल ही में शहरी विकास को नई दिशा देने के उद्देश्य से ₹1 लाख करोड़ के अर्बन चैलेंज फंड (Urban Challenge Fund – UCF) की घोषणा की है। सरकार का दावा है कि यह फंड शहरों को विकास केंद्र बनाने, जल आपूर्ति, सीवरेज, शहरी पुनर्विकास और निवेश आकर्षण जैसे क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। मॉडल ऐसा रखा गया है जिसमें 25 प्रतिशत तक सहायता केंद्र देगा, शेष राशि राज्यों, स्थानीय निकायों, बाजार संसाधनों और निजी भागीदारी से जुटाई जाएगी। उद्देश्य साफ बताया गया है कि सरकारी अनुदान पर पूर्ण निर्भरता खत्म कर बाजार आधारित, प्रतिस्पर्धी और जवाबदेह से शहरी विकास किया जाएगा।

कागज़ पर यह योजना महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी दिखाई देती है। लेकिन प्रश्न वहीं से शुरू होता है जहाँ से योजनाएँ ज़मीन पर उतरती हैं। देश पहले भी स्मार्ट सिटी मिशन जैसे बड़े कार्यक्रम देख चुका है। उस समय भी उम्मीदें ऊँची थीं, निवेश बड़ा था, प्रस्तुतीकरण आकर्षक था। कई शहरों में कुछ अच्छे कार्य भी हुए, लेकिन व्यापक स्तर पर यह सवाल बना रहा कि क्या निवेश के अनुपात में परिणाम मिले?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इसका एक उदाहरण है। रायपुर स्मार्ट सिटी मिशन का हिस्सा रहा, परंतु शहर के कुछ प्रोजेक्टों को लेकर जनता में निराशा भी सामने आई। एक सार्वजनिक स्थल के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च हुए और कुछ वर्षों के भीतर ही उसे हटाना पड़ा। यह केवल एक निर्माण की विफलता नहीं थी, बल्कि योजना, गुणवत्ता नियंत्रण और दीर्घकालिक सोच पर प्रश्नचिह्न था। हमने स्मार्ट सिटी रायपुर में हजार करोड़ बर्बाद होते देखा है। ऐसे में जब जनता देखती है कि टैक्स के पैसे से बना ढांचा टिक नहीं पा रहा, तो उसका विश्वास कमजोर होता है।

अर्बन चैलेंज फंड की घोषणा के साथ सरकार यह संकेत दे रही है कि अब शहरों को निवेश, रोजगार और आर्थिक गतिविधि के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। लेकिन यदि क्रियान्वयन की संरचना मजबूत नहीं होगी, तो वही पुरानी समस्या दोहराई जा सकती है। परियोजनाएँ शुरू होंगी, उद्घाटन होंगे, लेकिन निगरानी और जवाबदेही के अभाव में परिणाम अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचेंगे जैसा कि पहले होता रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी केंद्रीय योजना की सफलता तीन बातों पर निर्भर करती है पहला स्पष्ट दिशानिर्देश,दूसरा संस्थागत क्षमता और twesra 1सतत निगरानी। कई बार राज्य और स्थानीय निकायों के पास तकनीकी विशेषज्ञता और परियोजना प्रबंधन का ढांचा पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में धन तो आवंटित हो जाता है, पर उपयोग की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यदि शहरी निकायों को क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण और पारदर्शी ऑडिट व्यवस्था के साथ सशक्त नहीं किया गया, तो बड़े फंड भी सीमित प्रभाव ही छोड़ पाएंगे।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अर्बन चैलेंज फंड में निजी भागीदारी और बाजार संसाधनों पर विशेष बल दिया गया है। यह सकारात्मक पहल हो सकती है, बशर्ते नियामक ढांचा स्पष्ट और पारदर्शी हो। अन्यथा, परियोजनाएँ आर्थिक रूप से लाभकारी दिखाने के दबाव में सामाजिक संतुलन और समावेशिता से समझौता कर सकती हैं।

जनता की अपेक्षा आज पहले से कहीं अधिक है। केंद्रीय योजनाओं को लेकर उम्मीदें सीधे प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार से जुड़ती हैं। लेकिन क्रियान्वयन राज्य और स्थानीय स्तर पर होता है। यदि वहाँ पारदर्शिता, जिम्मेदारी और समयबद्धता सुनिश्चित नहीं होगी, तो जनता के मन में यह धारणा बनती है कि योजनाएँ घोषणा तक सीमित हैं। यह धारणा लोकतांत्रिक भरोसे के लिए चुनौती है।

अर्बन चैलेंज फंड की सफलता केवल बजट के आकार से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से तय होगी कि क्या इस बार निगरानी तंत्र मजबूत होगा, क्या परियोजनाओं की गुणवत्ता पर सख्त नियंत्रण होगा, क्या खर्च और परिणाम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होंगे, और क्या विफलताओं पर जवाबदेही तय की जाएगी। यदि इन बिंदुओं पर ठोस प्रावधान बने, तो यह योजना वास्तव में शहरों का कायाकल्प कर सकती है। यदि नहीं, तो यह भी एक महत्वाकांक्षी घोषणा बनकर रह सकती है।

अंततः सवाल फंड का नहीं, भरोसे का है। टैक्स देने वाली जनता चाहती है कि हर रुपये का उपयोग टिकाऊ, पारदर्शी और परिणामकारी हो। अर्बन चैलेंज फंड एक अवसर है व्यवस्था को सुधारने का, शहरी शासन को मजबूत करने का और योजनाओं को कागज़ से जमीन तक प्रभावी बनाने का। अब देखना यह है कि इस अवसर को सिस्टम किस गंभीरता से लेता है।

(देवेंद्र किशोर गुप्ता, 9039010330)


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