रायपुर/ साजा विधायक ईश्वर साहू को शायद कोई याद दिलाने वाला नहीं है कि राजनीति में उनकी पहचान किसी आंदोलन, संगठनात्मक संघर्ष या दशकों की राजनीतिक तपस्या से नहीं बनी थी। जनता की सहानुभूति, एक दुखद घटना और भाजपा के भरोसे ने उन्हें सीधे विधानसभा तक पहुंचा दिया।
लेकिन लगता है कि विधायक बनने के ढाई साल बाद उन्हें यह भ्रम हो गया है कि यह मुकाम उन्होंने अकेले अपने दम पर हासिल किया है। जिस व्यक्ति को जनता ने सिर आंखों पर बैठाया, वह आज तस्वीर में जगह न मिलने पर सार्वजनिक नाराजगी जता रहे है। मानो प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या पोस्टर में उनका फोटो न होना हो। जबकि साजा विधानसभा की जनता जिसने अपना बहुमूल्य वोट देकर उन्हें जिताया वो ही उनकी कार्यशैली, उनकी उदासीनता को लेकर दुःखी है। ऐसे में वहां की जनता अपनी नाराजगी कहां जताए ये बड़ा सवाल है। साथ ही एक बात ये भी है कि उनकी फोटो न होना प्रशासन की लापरवाही जरूर है पर विरोध का यह तारीख उनका ठीक नहीं है।
राजनीति में विनम्रता सबसे बड़ा आभूषण होती है। खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें संगठन और जनता ने विशेष परिस्थितियों में अवसर दिया हो। लेकिन जब आदमी अचानक मिले पद और प्रतिष्ठा को अपनी स्थायी उपलब्धि समझ बैठता है, तब उसे हर मंच पर सम्मान कम और अपमान ज्यादा दिखाई देने लगता है।
बेमेतरा के योग दिवस कार्यक्रम में यदि तस्वीर में स्थान नहीं मिला तो क्या जनता की समस्याएं समाप्त हो गईं? क्या साजा क्षेत्र में अब कोई मुद्दा नहीं बचा? क्या विधायक की प्रतिष्ठा अखबार की फोटो से तय होगी या जनता के बीच किए गए कामों से? वैसे यह पहला मौका नहीं है जब विधायक ईश्वर साहू विवादों में हूं। ऐसे कई वाक़िए है जो उनकी छवि को धूमिल करते दिखाई दे जाते है। भाजपा समस्या को और कार्यकर्ताओं की बीच भी उनका व्यवहार चर्चा का विषय बना रहता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीति में हजारों कार्यकर्ता जीवनभर मेहनत करते हैं, फिर भी उन्हें पहचान नहीं मिलती। वहीं कुछ लोगों को परिस्थितियां वह अवसर दे देती हैं, जिसके लिए दूसरे लोग दशकों तक संघर्ष करते हैं। ऐसे लोगों से अपेक्षा रहती है कि वे अधिक विनम्र होंगे, लेकिन कई बार उल्टा हो जाता है।
ईश्वर साहू को समझना चाहिए कि सहानुभूति से चुनाव जीता जा सकता है, लेकिन राजनीतिक सम्मान केवल व्यवहार और काम से मिलता है। तस्वीर में न दिखने से कोई नेता छोटा नहीं हो जाता, लेकिन तस्वीर के लिए सार्वजनिक रूप से रोष जताने से उसका राजनीतिक कद जरूर छोटा दिखाई देने लगता है।
राजनीति में एक पुरानी सीख है जिसे भाग्य, परिस्थितियों और संगठन ने उठाकर ऊंचाई दी हो, उसे शिकायत कम और कृतज्ञता ज्यादा दिखानी चाहिए।
( गजानंद नायक )