Wednesday | Jul 08, 2026
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गोपनीय बोलियां हुईं वायरल, फिर 800 करोड़ का टेंडर रद्द…आखिर एनआरडीए में चल क्या रहा है?

Raw File | 02 Jul 2026 | छत्तीसगढ़, प्रदेश

रायपुर/ लगभग ₹800 करोड़ की नवा रायपुर टाउन डेवलपमेंट स्कीम (TDS) का टेंडर आखिरकार रद्द करना पड़ा। यह निर्णय अपने आप में स्वीकारोक्ति है कि निविदा प्रक्रिया में कुछ तो गड़बड़ी हुई थी। पहले कथित रूप से गोपनीय वित्तीय बोलियां सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, एनआरडीए की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। अंततः एनआरडीए को पूरी प्रक्रिया निरस्त करनी पड़ी। यदि सब कुछ पारदर्शी और नियमों के अनुरूप था, तो इतनी बड़ी परियोजना को बीच रास्ते में रद्द करने की नौबत आखिर क्यों आई? यह प्रश्न हर उस नागरिक का है जिसके टैक्स के पैसे से सरकारी परियोजनाएं संचालित होती हैं।

सबसे चिंता की बात यह है कि टेंडर लीक की खबर के बाद शुरुआत में पूरे विवाद को गंभीरता से लेने के बजाय उसे सामान्य तकनीकी त्रुटि बताकर सीमित करने की कोशिश दिखाई दी। लेकिन जब मामला लगातार सुर्खियों में रहा, सवाल बढ़ते गए और सार्वजनिक चर्चा तेज हुई, तब जाकर टेंडर रद्द करना पड़ा। इससे यह संदेश भी जाता है कि यदि सवाल नहीं उठते, तो क्या प्रक्रिया उसी तरह आगे बढ़ जाती? यह प्रश्न अब निष्पक्ष जांच का विषय होना चाहिए।

यह यह केवल अधिकारियों की जिम्मेदारी तक सीमित मामला नहीं है। आवास एवं पर्यावरण विभाग के मंत्री ओ.पी. चौधरी इस विभाग के मुखिया है। उनके विभाग के अंतर्गत आने वाली इतनी बड़ी परियोजना में यदि ऐसी गंभीर प्रक्रियागत विफलता सामने आती है कि पूरी निविदा ही निरस्त करनी पड़े, तो मंत्री की नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही भी बनती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपलब्धियों का श्रेय मंत्री लेते हैं, तो गंभीर चूक की जिम्मेदारी से भी बच नहीं सकते।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपनी सरकार की पहचान सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को बताया है। इसलिए यह प्रकरण केवल एनआरडीए या एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की साख से जुड़ा हुआ है। यदि इस मामले में केवल टेंडर रद्द कर नई निविदा जारी कर दी गई और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो इससे गलत संदेश जाएगा कि गंभीर प्रक्रियागत चूक का भी कोई उत्तरदायी नहीं होता।

अब आवश्यकता केवल नई निविदा निकालने की नहीं है बल्कि यह स्पष्ट करने की है कि कथित गोपनीय वित्तीय जानकारी समय से पहले सार्वजनिक कैसे हुई? तकनीकी प्रक्रिया में चूक कहां हुई, किस स्तर पर निगरानी विफल रही और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं में जनता केवल विकास नहीं, ईमानदार और पारदर्शी विकास भी चाहती है।
टेंडर रद्द हो गया, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल बाकी है ।क्या जिम्मेदारी भी तय होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दहिया ने कुछ अहम सवाल उठाए है जिसे भी समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार निविदा समिति ने अधिकतम 232.35 एकड़ भूमि डेवलपर को देने का प्रावधान किया था। एनआरडीए के अनुमान के मुताबिक इस जमीन का बाजार मूल्य लगभग ₹4,500 प्रति वर्गफुट है। इस आधार पर भूमि का कुल मूल्य करीब ₹5,000 करोड़ बैठता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब ₹800 करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास कार्य के बदले लगभग ₹5,000 करोड़ मूल्य की सरकारी भूमि देना कितना उचित और सार्वजनिक हित में था? यदि यह प्रस्ताव मूल रूप से इसी स्वरूप में था, तो इसकी वित्तीय व्यवहार्यता और मूल्यांकन का आधार क्या था?

टेंडर रद्द होने के बाद अब अपेक्षा है कि पूरे प्रस्ताव, भूमि मूल्यांकन, निविदा प्रक्रिया और निर्णय लेने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की भी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सार्वजनिक संपत्ति के सर्वोत्तम उपयोग के सिद्धांतों का पूरी तरह पालन हुआ था या नहीं।


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