मरीज प्यासे हैं मंत्री जी, आपकी प्राथमिकता क्या है?
रायपुर/ राजधानी रायपुर के कालीबाड़ी स्थित जिला अस्पताल की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकती हैं। भीषण गर्मी के बीच अस्पताल में पानी तक उपलब्ध नहीं है। मरीजों के परिजन घरों से बाल्टियों में पानी भरकर ला रहे हैं। पीने का पानी नहीं, बाथरूमों में पानी नहीं, और प्रसूति वार्ड में भर्ती महिलाओं व उनके परिवारों को नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से है। स्वास्थ्य विभाग का मुखिया होने के नाते क्या उन्हें पता है कि राजधानी के जिला अस्पताल में मरीज पानी के लिए भटक रहे हैं? यदि पता नहीं है तो यह उनकी प्रशासनिक विफलता है, और यदि पता है तो यह उनकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
स्वास्थ्य मंत्री का काम केवल बैठकों, तबादलों और अधिकारियों की पोस्टिंग करना और मोटा माल डकारने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी पहली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि अस्पतालों में मरीजों को न्यूनतम मानवीय सुविधाएं मिलें। करोड़ों के बजट, बड़ी-बड़ी घोषणाओं और योजनाओं का क्या औचित्य है जब एक मरीज को अस्पताल में पानी तक न मिले? केवल भ्रष्टाचार करने के लिए यह विभाग सम्हाल रहे है क्या?
यहां पर बड़े आश्चर्य की बात यह भी है कि साल भर पहले 6 जून को मंत्री जी ने इस अस्पताल का निरीक्षण किया था। समस्याओं से अवगत हुए थे बावजूद आज 1 साल बाद भी सारी समस्याएं यथावत है। इसका मतलब यह साफ है कि मंत्री जी अपने काम के प्रति गंभीर नहीं है और न ही उनके विभाग में उनकी पकड़ है। मोटा माल देकर जिम्मेदार बने यहां के डॉक्टर अधिकारी भी भ्रष्टाचार में लिप्त है और मंत्री व उनके सहयोगियों को मलाई मिठाई खिलाकर,योग्य डॉक्टरों का हक मारकर निश्चिंत बैठ कुर्सी तोड़ रहे है। ऐसे में अस्पतालों में मंत्री जी का निरीक्षण केवल फोटोबाजी और रीलबाजी के लिए ही प्रतीत होता।

विडंबना यह है कि भाजपा की सरकार बनते ही श्याम बिहारी जायसवाल के नेतृत्व वाला स्वास्थ्य विभाग लगातार अव्यवस्थाओं, खरीद-फरोख्त,अनियमितताओं और प्रशासनिक अराजकता के आरोपों से घिरा हुआ है। बेईमानी के इतने किस्से है कि सुन सुन कर आप थक जाएंगे। ऐसे में जब राजधानी के अस्पताल में पानी का संकट सामने आता है, तो सवाल सीधे विभागीय नेतृत्व पर ही खड़े होता हैं।
एक गर्भवती महिला जब अस्पताल में पानी के लिए परेशान हो, एक मरीज का परिजन बाल्टी लेकर भटक रहा हो, तब स्वास्थ्य मंत्री को जवाब देना चाहिए कि आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था में उनकी प्राथमिकता क्या है?
मंत्री जी, अस्पताल इलाज का केंद्र होता है, मरीजों परिजनों की मजदूरी का नहीं, यहां मरीज दवा लेने आता है, पानी ढोने के लिए नहीं! यदि राजधानी के अस्पताल का यह हाल है तो दूर-दराज जिलों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
क्योंकि अस्पताल में पानी का सूखना केवल नल का सूखना नहीं है, यह व्यवस्था की जवाबदेही और नेतृत्व की प्राथमिकताओं के सूख जाने का संकेत भी है।
सत्ता में बड़े बनने के सपने देखने वाले मंत्री जी जनसेवा की छोटी सी जिम्मेदारी भी ठीक से नहीं निभा पा रहे है वहीं अपनी सरकार को बदनाम करने में बड़ी भूमिका निभाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे है।
@ देवेंद्र किशोर गुप्ता
(वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार संदीप शुक्ला है। जिन्होंने पूरे मामले का खुलासा किया है। कंप्लीट वीडियो उनके अपने यूट्यूब चैनल रॉ रिपोर्टर में कल 25 जून को देख सकते है)