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पीएचई ठेकेदारों को उनका हक दीजिए, हक़ साहब!

Raw File | 03 Jul 2026 | छत्तीसगढ़, प्रदेश

वर्षों से लंबित भुगतान के चलते परेशान है पीएचई विभाग के ठेकेदार!

रायपुर/ गांव-गांव पाइपलाइन बिछ गई, पानी की टंकियां खड़ी हो गईं, मोटरें चलने लगीं और लाखों ग्रामीणों के घरों तक नल से पानी पहुंचने लगा। लेकिन इस पूरी व्यवस्था को जमीन पर उतारने वाले अनेक ठेकेदार आज आर्थिक बदहाली की कगार पर खड़े हैं। किसी ने बैंक से कर्ज लिया, किसी ने निजी लोगों से ऊंचे ब्याज पर पैसा उठाया, किसी ने अपनी हैसियत से कई गुना अधिक काम ले कर आर्थिक मुसीबत में फंसे है। बहुतों का आज काम पूरा हो चुका है, गांव वाले पानी भी पी रहे हैं, लेकिन भुगतान वर्षों से अटका हुआ है। कर्ज का ब्याज बढ़ता जा रहा है और कई ठेकेदार आर्थिक रूप से टूट चुके हैं। ऐसी भी जानकारी मिली है कि दो ठेकेदारों ने आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या कर ली है। हालांकि रॉ फाइल इन घटनाओं की पुष्टि नहीं करता। आकाश और निराश ठेकेदार अब नीर भवन (पीएचई मुख्यालय) घेरने की तैयारी कर रहे है।

इन हालातों में पीएचई विभाग के सचिव और जल जीवन मिशन के एमडी मोहम्मद कैसर अब्दुल हक को चाहिए कि ठेकेदारों को जल्द से जल्द उनका वर्षों से लंबित भुगतान कराए, उन्हें उनका हक दिलाए।

एक ठेकेदार ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि उन्होंने लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से पाइपलाइन और मोटर लगाने का कार्य पूरा किया। जब अनुबंध हुआ था तब SNA (सिंगल नोडल एजेंसी) व्यवस्था लागू नहीं थी। अब भुगतान के लिए कलेक्टर का पूर्णतः प्रमाण-पत्र अनिवार्य कर दिया गया है। परंतु यह भी अनुबंध से इतर है और पेचीदगी बढ़ाता। कहना है कि प्रमाण-पत्र प्राप्त करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कहीं पंचायत स्तर पर अनावश्यक अड़चनें हैं, कहीं बिजली विभाग समय पर कनेक्शन नहीं देता। कई गांवों में लोग महीनों से पानी का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन हैंडओवर नहीं होने के कारण बिजली का बिल भी ठेकेदार ही भर रहे हैं। पंचायत यह कहकर जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देती है कि योजना अभी औपचारिक रूप से हस्तांतरित नहीं हुई है।

यह किसी एक ठेकेदार की कहानी नहीं है। जल जीवन मिशन से जुड़े अनेक ठेकेदार इसी तरह की परेशानियों से गुजर रहे हैं। कुछ लोगों ने अपनी क्षमता से अधिक काम लिया, कुछ ने जोखिम उठाया, लेकिन वर्षों तक भुगतान न मिलना किसी भी व्यवसाय को बर्बाद करने के लिए काफी है। कुछ लोगों के लिए यह इस तरह से भी है कि जी अपने पुराने पाप का अभी तक भुगत रहे है।

आपको बता दे कि जल जीवन मिशन में 2019 से 23 तक के वर्षों में विभाग में भारी अव्यवस्था रही। कुछ बड़े अधिकारियों और कुछ ठेकेदारों की मिलीभगत से जमकर मनमानी हुई। अनुभव और क्षमता से अधिक काम और सेटिंग के आधार पर काम भी लिए गए। कई लोगों ने उस दौर में खूब कमाया। लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। केंद्र सरकार ने भी व्यवस्था सख्त कर दी है। राज्य के विभागीय मंत्री उप मुख्यमंत्री अरुण साव भी सख्त है पर वे भी भुगतान में अनावश्यक विलंब नहीं चाहते।
भुगतान की प्रक्रिया पारदर्शी बना दी गई है और मनमानी की गुंजाइश काफी हद तक समाप्त हो गई है।

अब विडंबना यह है कि पहले जो लोग अफसरों के साथ मिलकर आसानी से काम निकाल लेते थे, वही आज नियमों और लंबित प्रक्रियाओं के बीच फंसकर भुगतान के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अतीत की गलतियों की जांच और दोषियों पर कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए, लेकिन वर्षों तक भुगतान रुका होना भी किसी सजा से कम नहीं है।

यह याद रखना भी जरूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत देश के हर ग्रामीण परिवार तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने की नेक मंशा से की थी। यह योजना ग्रामीण भारत के जीवन स्तर को बदलने का अभियान है। जिसमें भ्रष्टाचार की शिकायतों के बाद आज केंद्र सरकार ने SNA (सिंगल नोडल एजेंसी) जैसी नई व्यवस्था लागू की ताकि सरकारी धन का दुरुपयोग रुके और भुगतान पूरी पारदर्शिता के साथ हो।

यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की जिम्मेदारी उपमुख्यमंत्री अरुण साव को मिली। निश्चित ही उन्होंने पहले से बिगड़ी व्यवस्था को सुधारने का कार्य किया है। लगातार समीक्षा, मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय करने के कारण आज जल जीवन मिशन पहले की तुलना में बेहतर गति से आगे बढ़ रहा है। घर-घर नल कनेक्शन का काम तेज हुआ है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल मिशन एमडी अब्दुल मोहम्मद अब्दुल कैसर हक़ पर खड़ा होता है। यदि भारत सरकार से लगभग साढ़े छह सौ करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध हो चुकी है, पुराने कामों के लगभग 50 प्रतिशत भुगतान अगर हो चुका है, तो फिर राशि होने के बाद भी शेष राशि का भुगतान ठेकेदारों को कराने के लिए विशेष अभियान उनके द्वारा क्यों नहीं चलाया जा रहा? यदि कलेक्टरों के पास पूर्णता प्रमाण-पत्र लंबित हैं तो उन्हें समयबद्ध तरीके से जारी कराने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि पंचायतों और बिजली विभाग के कारण योजनाएं अटक रही हैं तो विभागीय समन्वय कौन करेगा? इन सवालों का जवाब हक़ साहब को देना चाहिए।

सचिव और मिशन संचालक होने के नाते उनकी जिम्मेदारी केवल फाइलें चलाने तक सीमित नहीं है। उन्हें सभी कलेक्टरों के साथ बैठक कर लंबित पूर्णतः प्रमाण-पत्रों का निराकरण कराना चाहिए। बिजली विभाग और पंचायतों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए तथा जिन ठेकेदारों ने वास्तव में कार्य पूरा कर दिया है, उनका भुगतान शीघ्र सुनिश्चित कराना चाहिए। यदि दो महीने से केंद्र सरकार की राशि उपलब्ध होने के बावजूद भुगतान सरकारी खातों में अटका पड़ा है तो यह केवल प्रक्रियागत देरी नहीं, बल्कि उनकी अपनी प्रशासनिक उदासीनता और लापरवाही का कारण है।

इस पूरे मामले में विभागीय मंत्री अरुण साव का पक्ष स्पष्ट है। उनका कहना है कि भारत सरकार द्वारा लागू SNA व्यवस्था का पालन अनिवार्य है और निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी किए बिना भुगतान संभव नहीं है। साथ ही उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि लंबित औपचारिकताओं को जल्द पूरा कराकर पात्र ठेकेदारों का भुगतान जल्द कराया जाए ताकि जल जीवन मिशन की गति प्रभावित न हो। सूत्र बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में उच्च अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई है और समय सीमा तय करके निराकरण के निर्देश दिए है।

यहां पर हक़ साहब को यह समझना होगा कि जब मंत्री की मंशा साफ है तो उन्हें भी उतनी ही संवेदनशीलता, तत्परता और जवाबदेही दिखानी होगी। नहीं तो उनकी यह नाफरमानी सुशासन की राह पर रुकावट मानी जाएगी।


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