“जड़ों से जुड़ने की पुकार: जूदेव की विरासत, साय का नेतृत्व”
रायपुर/ छत्तीसगढ़ की धरती केवल प्राकृतिक संसाधनों के लिए नहीं, बल्कि अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों और सनातन परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब यह सांस्कृतिक धरोहर सुनियोजित तरीके से चुनौती के घेरे में आ गई। आदिवासी अंचलों में प्रलोभन, दबाव और भ्रम के माध्यम से धर्मांतरण की घटनाएं लगातार सामने आने लगीं। असल में यह केवल धर्म परिवर्तन का मामला नहीं था, बल्कि यह पहचान, परंपरा और सामाजिक संतुलन पर सीधा आघात था।
इसी दौर में एक नाम सूर्य की भांति चमकता नजर आया वो था दिलीप सिंह जूदेव का। जिन्हें लोग केवल नेता नहीं, बल्कि “हिंदू हृदय सम्राट” के रूप में जानते हैं। जूदेव जी ने धर्मांतरित हो चुके वनवासियों के बीच जाकर, उनके चरण धोते हुए जो “घर वापसी” अभियान चलाया, वह सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक व्यापक जनआंदोलन था।
जूदेव जी खुले मंचों से कहते थे “धर्मांतरण केवल आस्था का नहीं, हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।” उनका यह संदेश सीधे उन हजारों परिवारों तक पहुंचा, जो लालच या दबाव में अपनी परंपराएं छोड़ने को मजबूर हो रहे थे। जूदेव जी ने न केवल उन्हें वापस सनातन में लौटने का मार्ग दिखाया, बल्कि उनके भीतर आत्मगौरव की भावना भी जगाई।
समय बदला, लेकिन जूदेव जी की वह प्रतिज्ञा और संघर्ष की विरासत जिंदा रही। और आज वही विरासत आगे बढ़ा रहे हैं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जो जूदेव जी का शिष्य है।
कानून नहीं, संकल्प का विस्तार: धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026
विधानसभा में पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को केवल एक कानूनी दस्तावेज मानना इसकी व्यापकता को कम आंकना होगा। यह उस संघर्ष का विधायी रूप है, जिसकी नींव जूदेव जी ने वर्षों पहले रखी थी।
इस कानून की विशेषता इसकी सख्ती नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता और संरचनात्मक मजबूती है। अब धर्म परिवर्तन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को पूरी तरह नियमों के दायरे में लाया गया है। जिसमें पूर्व सूचना अनिवार्य,प्रशासनिक जांच,सार्वजनिक सूचना प्रक्रिया और प्रलोभन, दबाव या छल पाए जाने पर कठोर दंड सुनिश्चित है। इससे यह भी स्पष्ट संदेश है कि अब छत्तीसगढ़ में आस्था के नाम पर किसी भी प्रकार का खेल स्वीकार नहीं किया जाएगा।
वनवासियों की आस्था और पहचान की रक्षा 
छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल राज्य है, जहां की संस्कृति प्रकृति, परंपरा और सनातन मूल्यों से गहराई से जुड़ी हुई है। लेकिन वर्षों से कई क्षेत्रों में ऐसे प्रयास हुए, जहां आर्थिक सहायता, शिक्षा या स्वास्थ्य के नाम पर लोगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया गया।
जूदेव जी ने इस खतरे को बहुत पहले पहचान लिया था। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद किया, उन्हें उनके इतिहास और परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया। यही कारण है कि उनका “घर वापसी” अभियान आज भी एक मिसाल माना जाता है। आज, मुख्यमंत्री साय उसी भावना को नीति और कानून के स्तर पर सशक्त कर रहे हैं।
नक्सलवाद और धर्मांतरण: दोहरी चुनौती पर प्रहार
छत्तीसगढ़ लंबे समय से नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या से जूझता रहा है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सामाजिक असंतुलन, पहचान का संकट और बाहरी प्रभाव इन समस्याओं को और जटिल बनाते हैं।ऐसे में साय सरकार की यह सोच स्पष्ट दिखती है कि सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक मजबूती से भी नक्सलवाद का समाधान निकलेगा। धर्म स्वातंत्र्य कानून और नक्सलवाद के खिलाफ कठोर नीति दोनों मिलकर एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जो छत्तीसगढ़ को अंदर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।
वर्तमान नहीं, भविष्य की राजनीति
छत्तीसगढ़ में अक्सर यह कहा जाता है कि “जमीन पर काम दिख नहीं रहा।” लेकिन सच्चाई यह भी है कि कई बदलाव ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में दिखता है। विष्णुदेव साय की सरकार जिस गंभीरता से सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर काम कर रही है, वह दीर्घकालिक स्थिरता की ओर संकेत करता है। यह सरकार केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की जड़ों को मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
गुरु की विरासत, शिष्य का संकल्प
स्व. दिलीप सिंह जूदेव का जीवन एक मिशन था।सनातन की रक्षा, वनवासियों का उत्थान और सांस्कृतिक अस्मिता की सुरक्षा। आज जब विष्णुदेव साय उसी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए एक मजबूत कानून के जरिए उस विचार को संस्थागत रूप दे रहे हैं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि यह केवल सरकार का निर्णय नहीं, बल्कि एक अधूरी प्रतिज्ञा की पूर्णता है।
छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 केवल अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने का कानून नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है।यह उस संघर्ष का परिणाम है, जिसे जूदेव जी ने शुरू किया और जिसे अब साय सरकार नई दिशा दे रही है।
आने वाले समय में इसका असर केवल कानून तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ को एक सशक्त, संतुलित और सांस्कृतिक रूप से जागरूक राज्य के रूप में स्थापित करेगा। ऐसा माना जा सकता है कि जूदेव की प्रतिज्ञा अब साय के संकल्प में बदल चुकी है और यह यात्रा अभी जारी है।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)