Sunday | Jun 21, 2026
The Raw File

हर सरकार ईमानदार, फिर घोटाले कौन करता है?

दिल्ली/ रायपुर/ 27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि ठोस सबूत नहीं है। आपराधिक साजिश सिद्ध नहीं होता। इसलिए दोषमुक्त किया जा रहा है। हम देखे तो कानून की नजर में मामला खत्म हो गया है लेकिन जनता के मन में एक पुराना सवाल फिर खड़ा हो गया। क्या इस देश में बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार कभी अंत तक साबित हो पाएगा या नहीं?

भारतीय राजनीति का इतिहास उठाकर देखिए। हर दशक में कुछ बड़े घोटाले सुर्खियों में आते हैं, हजारों करोड़ के आंकड़े सामने आते हैं, एजेंसियां सक्रिय होती हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, जेल और जमानत का दौर चलता है…और फिर सालों बाद अदालत में वही लाइन सुनाई देती है “सबूत पर्याप्त नहीं।”

2G मामला इसका उदाहरण रहा। कोयला आवंटन विवाद भी लंबे समय तक चर्चा में रहा। कई मामलों में जांच चली, कुछ में सजा हुई, कई में आरोप साबित नहीं हो पाए।

अरविंद केजरीवाल की राजनीति ईमानदारी के वादे के साथ शुरू हुई थी। व्यवस्था बदलने की बात की गई थी। लेकिन जब वही टीम शराब नीति विवाद में फंसी तो सवाल सिर्फ कानूनी नहीं रहा, नैतिक भी बन गया था। आज अदालत ने उन्हें और उनके साथियों को राहत दे दी है, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव में यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है।

और सच तो यह है कि यह कहानी सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार के दौरान नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी जैसी योजनाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरागत मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन समय-समय पर विपक्ष ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन और फंड उपयोग पर सवाल उठाए। इसी तरह DMF (District Mineral Foundation) फंड के उपयोग को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप होते रहे कहीं पारदर्शिता की मांग उठी, तो कहीं जांच की मांग। यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन मुद्दों पर कई आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं।
दूसरी ओर, रमन सिंह सरकार के समय चावल वितरण और पीडीएस व्यवस्था को लेकर भी विपक्ष ने बड़े आरोप लगाए थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर कई बार अनियमितताओं और कथित घोटाले की चर्चाएं राजनीति के केंद्र में रहीं। आरोप लगे, बहस हुई, लेकिन जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि आखिर दोषी कौन साबित हुआ? राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर मामला वर्षों तक सुर्खियों में रहा। विदेशी सौदों, दलाली और राजनीतिक नामों को लेकर तीखी बहस हुई, जांच एजेंसियां सक्रिय रहीं, लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच जनता को अभी भी अंतिम और साफ निष्कर्ष का इंतजार है।

यानी तस्वीर साफ है कि पार्टी कोई भी हो, आरोप लगभग हर सरकार पर लगते हैं। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार पर बहस जस की तस रहती है। क्योंकि समस्या शायद व्यक्ति नहीं, सिस्टम है।

जांच एजेंसियां राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं। मुकदमे वर्षों चलते हैं। गवाह कमजोर पड़ते हैं। फाइलें मोटी होती जाती हैं, लेकिन फैसले देर से आते हैं। इस बीच आरोपी जमानत पर बाहर रहते हैं, राजनीति करते हैं, चुनाव लड़ते हैं और जनता धीरे-धीरे यह मानने लगती है कि न्याय एक लंबी प्रक्रिया है परिणाम नहीं। और यही लोकतंत्र की सबसे खतरनाक स्थिति है जब जनता का भरोसा कमजोर होने लगता है।

अगर सब ईमानदार हैं तो विकास योजनाओं का पैसा बीच में कहां जाता है? सड़कें बार-बार क्यों टूटती हैं? अस्पतालों और स्कूलों की हालत पर हर सरकार में सवाल क्यों उठते हैं? आखिर क्यों हर नई सरकार पुरानी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती है और कुछ साल बाद खुद उन्हीं सवालों के घेरे में आ जाती है?
सच्चाई यह है कि आज भ्रष्टाचार सिर्फ एक आरोप नहीं, एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। विपक्ष में रहते हुए हर नेता व्यवस्था बदलने की बात करता है, लेकिन सत्ता में आते ही वही सिस्टम उसे घेर लेता है।
आज केजरीवाल बरी हुए हैं। कल किसी और को राहत मिलेगी। पर असली सवाल वही रहेगा क्या भारत में कभी ऐसा समय आएगा जब बड़े भ्रष्टाचार मामलों में तेज, पारदर्शी और निर्णायक न्याय दिखेगा?
क्योंकि जनता के मन में एक कड़वी धारणा बन चुकी है जो पकड़ा गया वही चोर, बाकी सब व्यवस्था के हिस्सेदार। फैसले आते रहेंगे, बहस चलती रहेगी, आरोप लगते रहेंगे… लेकिन जब तक न्याय व्यवस्था आम आदमी को स्पष्ट और निर्णायक परिणाम दिखाने में सफल नहीं होगी तब तक हर बरी होने वाला फैसला जनता के मन में एक ही सवाल छोड़ जाएगा। क्या इस देश में भ्रष्टाचार सिर्फ आरोप बनकर रह जाएगा, अपराध कभी नहीं बनेगा?


Raw File



संबंधित खबरें