नकटी की जमीन पर सवालों के तूफान में घिर रहे है विधानसभा अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह!
रायपुर/छत्तीसगढ़ विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले नया रायपुर से लगे ग्राम नकटी की जमीनें अचानक प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक कहानी बन गई हैं। जिस गांव में सरकार विधायकों के लिए नई आवासीय कॉलोनी बसाने जा रही है, जहां हाल ही में लगभग 80 परिवारों से अतिक्रमण हटाया गया, उसी गांव के राजस्व दस्तावेज़ अब सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों तक पहुंचते हुए कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
ग्राम नकटी की यह कोई साधारण सरकारी परियोजना नहीं है। विधायक आवास का मतलब है कि आने वाले वर्षों में यही क्षेत्र प्रदेश का नया वीआईपी जोन बनेगा। विधायक, मंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग यहीं रहेंगे। करोड़ों रुपये का सरकारी निवेश होगा। सड़कें, बिजली, पानी, सुरक्षा और तमाम सुविधाएं विकसित होंगी। ऐसे किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट के बाद आसपास की जमीनों का मूल्य स्वाभाविक रूप से बढ़ता ही है।
अब यहीं से नकटी की कहानी दिलचस्प होती है और गंभीर भी। हमारे हाथ लगे वर्ष 2024-25 के बी-1 और पी-2 राजस्व अभिलेख बताते हैं कि ग्राम नकटी जिला एवं तहसील रायपुर के हल्का नंबर 00077 में कुल रकबा 1.0520 हेक्टेयर भूमि (लगभग 2.60 एकड़ या लगभग 113,200 वर्ग फुट)।

अलका डेवलपर्स के नाम दर्ज है। रिकॉर्ड में स्पष्ट उल्लेख है “अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत शौर्य सिंह सिसोदिया, पिता वी.के. सिसोदिया” मौल श्री विहार रायपुर । इसी खाते में खसरा क्रमांक 656/1, 656/2, 657/1, 657/2, 658, 659/1, 661 और 662 भी दर्ज हैं।

अब इस कहानी का दूसरा पक्ष देखिए। वी.के. सिसोदिया यानी विक्रम सिंह सिसोदिया वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के ओएसडी हैं।
सार्वजनिक रूप से यह भी ज्ञात है कि वे 20 वर्षों से डॉ. रमन सिंह के साथ प्रशासनिक भूमिका में जुड़े रहे हैं। दूसरी ओर, स्वयं डॉ. रमन सिंह यह कह चुके हैं कि नकटी में विधायक आवास बसाने का विचार नया नहीं था, बल्कि 10 -15 साल पहले का था। इसका मतलब था कि उनके नजदीकी यह बात जानते ही थे।

यहीं से हमारे मन में सबसे बड़ा सवाल उठता है।
डॉ. रमन सिंह जी यदि विधायक आवास की योजना वर्षों से विचाराधीन थी और उस समय इस परियोजना से जुड़े निर्णय सरकार के सर्वोच्च स्तर पर लिए जा रहे थे। क्या उस समय परियोजना की जानकारी सार्वजनिक थी या केवल सरकारी स्तर पर सीमित थी? क्या इस पूरे घटनाक्रम की आधिकारिक टाइमलाइन सार्वजनिक आप करना चाहेंगे? 
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से केवल ईमानदारी ही नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शिता की भी अपेक्षा की जाती है जिससे किसी प्रकार के हितों के संभावित टकराव का संदेह न रहे। 
इस मामले में उपलब्ध दस्तावेज़ भूमि का रिकॉर्ड दिखाते हैं। दस्तावेज़ यह भी दिखाते हैं कि संबंधित खाते में किसका नाम किस रूप में दर्ज है। लेकिन अब इससे आगे की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित पक्षों की है कि वे पूरे घटनाक्रम पर तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दें।
यदि भूमि खरीद पूरी तरह सामान्य और नियमों के अनुरूप हुई, तो उसकी समयरेखा सार्वजनिक करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। बल्कि ऐसा करने से जनता के मन में उठ रहे सभी सवाल स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
लेकिन यदि विधानसभा अध्यक्ष चुप रहेंगे तो मानिए सवाल और गहरे होंगे। क्या विधायक आवास परियोजना तय होने से पहले ही उस क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों से जुड़े परिवारों द्वारा भूमि खरीदी गई थी? क्या यह केवल संयोग है?
या फिर इस पूरे मामले में किसी स्वतंत्र एजेंसी से हितों के संभावित टकराव की जांच विधानसभा अध्यक्ष महोदय करवाएंगे?
मेरा ये प्रश्न किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए हैं।
क्योंकि संवैधानिक पदों से जुड़े लोगों के कार्यालयों पर जनता का भरोसा सबसे अधिक होता है। ऐसे में यदि कोई संदेह पैदा होता है, तो उसे खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि दस्तावेज़, समयरेखा और निष्पक्ष जांच है।

कल विधानसभा का सत्र शुरू होगा। अब देखना यह है कि क्या नकटी की जमीन का यह मामला सदन में गूंजेगा। क्या विधानसभा अध्यक्ष का कार्यालय इस पर अपना पक्ष रखेगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या जनता के मन में उठे इन संदेहों को दूर करने के लिए स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
साभार – दक्षिण कौशल
क्योंकि सवाल विधानसभा अध्यक्ष के साथ जुड़े सरकारी कर्मचारियों के सिर्फ 1.0520 हेक्टेयर यानी 25 करोड़ मूल्य की जमीन का नहीं है। सवाल है जनता के विश्वास का। और लोकतंत्र में जनता का भरोसा किसी भी सरकारी परियोजना से कही बड़ा होता है। उम्मीद है डॉ.रमन सिंह जी इस विषय पर जवाब जरूर देंगे।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)