Sunday | Jun 21, 2026
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गुलज़ार होंगे बार, संकट में रहेंगे छोटे अस्पताल!

राज्य के हालात बार की संख्या से नहीं अपितु अस्पतालों व्यवस्था से तय होगी। इतिहास यह जरूर पूछेगा कि जब राजस्व और जनस्वास्थ्य के बीच संतुलन साधने का अवसर था, तब प्राथमिकता किसे दी गई थी।

रायपुर/ राज्य में एक तरफ बार लाइसेंस की फीस और न्यूनतम गारंटी कम कर नए बार खोलने का रास्ता आसान किया जा रहा है। दूसरी तरफ छोटे अस्पतालों के प्रतिनिधि आरोप लगा रहे हैं कि नई शर्तों, पोर्टल प्रक्रियाओं और कड़े बनाए गए नियमों और दबावों ने उनके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि इन दोनों में कौन-सी बात या खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली सवाल यह है कि हमारे राज्य की प्राथमिकता किस दिशा में झुक रही है।

शराब से मिलने वाला राजस्व सरकारों के लिए हमेशा आकर्षक रहा है। आबकारी आय नकद और नियमित होती है। जितनी बिक्री, उतना टैक्स, उतना राजस्व तर्क साफ और सीधा है। लेकिन यह कहानी का आधा हिस्सा है। दूसरा हिस्सा है सामाजिक लागत, जिसका हिसाब अक्सर बजट की किसी एक पंक्ति में दिखाई नहीं देता। 
जब शराब की उपलब्धता आसान होती है, तो उपभोग बढ़ता है। यह आर्थिक व्यवहार का सामान्य सिद्धांत है। उपभोग बढ़ेगा तो उससे जुड़ी समस्याएँ भी बढ़ेंगी। सड़क दुर्घटनाएँ, घरेलू हिंसा, पारिवारिक आय का क्षरण, कार्यदिवसों की हानि, नशे से जुड़ी बीमारियाँ, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, ये सब किसी एक विभाग का बोझ नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ने वाली कीमत हैं। स्वास्थ्य विभाग का खर्च बढ़ता है।पुलिस और न्याय व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है। लेकिन इन सबका जोड़ कभी एक समेकित सामाजिक लागत के रूप में सार्वजनिक नहीं किया जाता। 

क्या राज्य ने कभी पारदर्शी तरीके से यह बताया है कि शराब से मिलने वाली आय के मुकाबले सामाजिक-स्वास्थ्य व्यय कितना बढ़ा? यदि नहीं, तो राजस्व का तर्क भी अधूरा है। राजस्व की चमक में समाज की दरारें अक्सर दिखती नहीं, लेकिन वे गहराती जरूर हैं। 

इसी के समानांतर छोटे अस्पतालों की स्थिति पर नजर डालिए। 20 से 50 बेड वाले अस्पताल, नर्सिंग होम और स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान ही आम नागरिक की पहली उम्मीद होते हैं। हर बीमार आपात स्थिति सबसे पहले इन्हीं के दरवाजे पर पहुँचती है। बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल कुछ चुनिंदा शहरों में हैं, लेकिन कस्बों और मोहल्लों की सेहत इन छोटे संस्थानों पर टिकी है। यदि नियम इतने जटिल और कठोर बना दिए जाएँ कि वे टिक ही न सकें, तो नुकसान किसका होगा? न तो बड़े अस्पतालों का, न सरकार का. बल्कि उस आम परिवार का, जिसे पास के अस्पताल में इलाज मिल जाता था।

यह बहस शराब बनाम अस्पताल का नहीं है। यह बहस नीति-संतुलन की है। यदि बार खोलना आसान और अस्पताल चलाना कठिन दिखाई देने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी है। राज्य का पहला दायित्व नागरिक का स्वास्थ्य है, न कि उपभोग की सहजता।
विडंबना यह है कि शराब से मिलने वाला राजस्व बढ़ेगा, लेकिन उससे उत्पन्न सामाजिक और स्वास्थ्य समस्याओं का उपचार फिर उन्हीं अस्पतालों को करना होगा, जिनके अस्तित्व पर दबाव बताया जा रहा है। यह एक ऐसा चक्र है जो अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को ही कमजोर करता है।

यह भी स्पष्ट है कि पूर्ण प्रतिबंध कोई सरल समाधान नहीं है। प्रतिबंध काला बाजार और अवैध गतिविधियों को जन्म देता है। लेकिन ढील और प्रोत्साहन के साथ संतुलन और सामाजिक सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए। यदि शराब नीति में “व्यवसाय सुगमता” का सिद्धांत लागू हो सकता है, तो स्वास्थ्य क्षेत्र में “सेवा सुगमता” क्यों नहीं?
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ चिकित्सक एवं समाजसेवी डॉ. राकेश गुप्ता का मानना है कि छोटे अस्पतालों को दंडात्मक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सहयोगात्मक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। चरणबद्ध अनुपालन, तकनीकी सहायता और वित्तीय सहूलियत के साथ। नीति बनाते समय अवसर लागत को भी समझना होगा। अल्पकालिक राजस्व आकर्षक हो सकता है, लेकिन यदि दीर्घकालिक सामाजिक संरचना कमजोर होती है, तो वह लाभ नहीं स्थाई हानि है। विकास केवल लाइसेंस घटाने से नहीं मापा जाता, विकास नागरिकों की जीवन गुणवत्ता, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता से मापा जाता है।
अब समय है कि सरकार स्पष्ट और पारदर्शी सामाजिक प्रभाव आकलन सार्वजनिक करे। कितना राजस्व आया, उससे जुड़ी स्वास्थ्य और सामाजिक लागत कितनी बढ़ी, दुर्घटनाओं और अपराध के आंकड़े क्या कहते हैं। साथ ही यह भी बताए कि छोटे अस्पतालों को मजबूत करने के लिए ठोस कदम क्या उठाए जा रहे हैं।
क्योंकि अंततः राज्य की मजबूती बार की संख्या से नहीं, अस्पतालों की मजबूती से तय होगी। इतिहास यह जरूर पूछेगा कि जब राजस्व और जनस्वास्थ्य के बीच संतुलन साधने का अवसर था, तब प्राथमिकता किसे दी गई थी।

अंत में सवाल यह भी है कि प्रदेश सरकार में आखिर वो कौन है जो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सोच के विपरीत कार्य करने की कोशिश कर रहा है! क्योंकि पहले भी कुछ निर्णय ऐसे हुए कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद सरकार को यूटर्न लेना पड़ा। यहां पर भी कुछ ऐसे निर्णय हो रहे है जो उनकी सोच के बिल्कुल विपरीत जान पड़ रहे है। और यह निर्णय ऐसे हैं जो भविष्य में सरकार के लिए परेशानी का सबक बन जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि ऐसे महत्वपूर्ण आदेशों और निर्देशों के दूसरे पहलुओं पर भी गंभीरता के साथ चिंतन मनन किया जाए।


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