अंतर्कलह से जूझ रही है छत्तीसगढ़ की कांग्रेस
रायपुर/ छत्तीसगढ़ कांग्रेस में इन दिनों ‘कुर्सी का खेल’ फिर से शुरू हो गया है। हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने टीएस सिंहदेव को दिल्ली की राजनीति करने की सलाह दी, तो बदले में बाबा ने बैज को मुख्यमंत्री बनने का ‘आशीर्वाद’ दे दिया। बाहर से सुनने में यह सहज राजनीतिक टिप्पणी लग सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में इसे ‘दिन में देखे जा रहे दिवास्वप्न’ के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ये नेता धरातल की वास्तविकता से पूरी तरह कट चुके हैं?
भूपेश को ‘किनारा’ करने की साजिश?
कांग्रेस के भीतर एक बड़ा खेमा इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को व्यवस्थित तरीके से हाशिए पर धकेलने की कोशिशों में जुटा है। लेकिन आज एक सच यह भी है कि छत्तीसगढ़ में एक बड़ा वर्ग कांग्रेस मतलब भूपेश बघेल मान रहा हैं। भले ही उनकी पिछली सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों और विवादों में घिरी रही हो, परंतु जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच जो पकड़ भूपेश बघेल की है, वह अन्य किसी नेता के पास नहीं है।
दीपक बैज या टीएस सिंहदेव के बयानों में छिपी ‘मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा’ का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। यह उन लोगों का एक छोटा सा षड्यंत्र मात्र है जो भूपेश बघेल के विशाल कद के सामने बौने साबित हो रहे हैं। सच तो यह है कि इन नेताओं की इतनी हैसियत ही नहीं है कि वे भूपेश बघेल को छत्तीसगढ़ की राजनीति से किनारा कर सकें।
नेतृत्व की शून्यता और चरणदास महंत की ‘सरेन्डर’ पॉलिटिक्स
विपक्ष में रहते हुए भूमिका निभाने के लिए ‘दमदार आवाज’ की जरूरत होती है। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की भूमिका को देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्होंने सरकार के आगे पहले ही हथियार डाल दिए हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश का सबसे बड़ा विपक्षी नेता सरकार के उस मंत्री का सार्वजनिक रूप से बचाव करता फिर रहा है, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। जब नेता प्रतिपक्ष का स्टैंड ही स्पष्ट न हो, तो भाजपा की विष्णु देव साय की प्रचंड जनादेश वाली दमदार सरकार के सामने कांग्रेस का यह ‘सपनों वाला विजन’ हास्यास्पद ही लगता है।
भाजपा का ‘दम’ और कांग्रेस का ‘भ्रम’
आज छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय की सरकार एक मजबूत और स्थिर दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद के लिए आपस में ही शह-मात का खेल खेलना जनता के बीच उनकी गंभीरता को कम कर रहा है। कांग्रेस के ये ‘स्वयंभू नेता’ अगर मुख्यमंत्री बनने का सपना देख भी रहे हैं, तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि भूपेश बघेल के बिना कांग्रेस का छत्तीसगढ़ में कोई वजूद नहीं है।
कांग्रेस में चल रही यह खींचतान इस बात का संकेत है कि पार्टी न केवल दिशाहीन है, बल्कि आंतरिक कलह से भी जूझ रही है। एक तरफ भाजपा का शासन ‘विकास और मजबूती’ के नारे के साथ आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता अपनी कुर्सी बचाने और दूसरे की कुर्सी छीनने की फिक्र में लगे हैं।
जनता सब देख रही है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि ‘सपनों का महल’ बनाने से पहले उन्हें जमीन पर उतरकर ठोस विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। वरना, आने वाले समय में ये आपसी बयानबाजी और ‘मुख्यमंत्री पद की जंग’ कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में और भी हाशिए पर धकेल देगी।