रायपुर/नवा रायपुर की लगभग 1,100 एकड़ में विकसित होने वाली टाउन डेवलपमेंट स्कीम (TDS) की ई-टेंडरिंग प्रक्रिया गंभीर विवादों में घिर गई है। आरोप है कि करीब ₹800 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की 7 कंपनियों की गोपनीय वित्तीय बोलियां टेंडर खुलने से पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। 11 जून 2026 अंतिम तिथि वाली इस निविदा को 26 जून (सरकारी अवकाश) के दिन खोले जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
वायरल दस्तावेजों में कंपनियों के कथित कोटेशन 136.63 से 197.17 एकड़ तक दर्ज हैं। यदि ये दस्तावेज वास्तविक हैं, तो यह केवल डेटा लीक नहीं बल्कि पूरी ई-टेंडरिंग प्रणाली की गोपनीयता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल है। इतना ही नहीं, एक ऐसी कंपनी के भी प्रक्रिया में शामिल होने की चर्चा है, जिसे पहले कथित रूप से निविदा शर्तों के उल्लंघन के कारण ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पात्रता की जांच ठीक से हुई थी?

अब मांग उठ रही है कि पूरी निविदा प्रक्रिया पर रोक लगाकर स्वतंत्र फॉरेंसिक आईटी ऑडिट कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गोपनीय जानकारी सिस्टम से लीक हुई या किसी अंदरूनी मिलीभगत का परिणाम है।
यदि गोपनीय वित्तीय बोलियां वास्तव में पहले ही सार्वजनिक हो गई थीं, तो यह केवल एक विभाग की चूक नहीं बल्कि ई-टेंडरिंग प्रणाली की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न है। भारत में इससे पहले भी कई सरकारी विभागों में ई-टेंडरिंग में डेटा लीक, पोर्टल से छेड़छाड़, कार्टेल और अनियमितताओं के आरोप सामने आ चुके हैं। इसी कारण केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और वित्त मंत्रालय ने समय-समय पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं कि वित्तीय बोलियां एन्क्रिप्टेड रहें, निर्धारित समय से पहले किसी को उपलब्ध न हों, और उनका खुलना केवल अधिकृत अधिकारियों द्वारा निर्धारित समय पर डिजिटल प्रक्रिया से ही हो।
ऐसे मामलों में सामान्यतः जिन कदमों की अपेक्षा की जाती है, उनमें पूरे सर्वर और ई-टेंडर पोर्टल का फॉरेंसिक आईटी ऑडिट, सिस्टम लॉग (Audit Logs) की जांच, किस IP और किस यूजर ने कब दस्तावेज़ एक्सेस किए, इसकी पड़ताल, डिजिटल सिग्नेचर और एन्क्रिप्शन रिकॉर्ड का सत्यापन, तथा जांच पूरी होने तक निविदा प्रक्रिया पर रोक शामिल हैं। यदि जांच में यह साबित हो जाए कि गोपनीय वित्तीय जानकारी समय से पहले लीक हुई थी, तो सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार पूरी निविदा प्रक्रिया को निरस्त कर दोबारा पारदर्शी तरीके से कराना भी एक विकल्प माना जाता है।
अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल तकनीकी खामी थी, किसी व्यक्ति की लापरवाही थी, या फिर किसी को लाभ पहुंचाने के लिए गोपनीय जानकारी बाहर आई? इसका जवाब केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच ही दे सकती है। क्योंकि यदि सरकारी ई-टेंडरिंग प्रणाली की गोपनीयता ही सुरक्षित नहीं रहेगी, तो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता पर भरोसा भी कमजोर होगा।
हालांकि नवा रायपुर के सीईओ चंदन कुमार इस मामले को भ्रामक बता रहे है। परंतु धुआं अगर उठा है तो कहीं ना कहीं तो आग लगी है। इसलिए मामले की निष्पक्षता से जांच हो जाए तो ही बेहतर है। आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी जी को भी चाहिए कि अपने विभाग के इस मामले को गंभीरता से ले और त्वरित कार्रवाई कराए।
(रॉ फाइल ब्यूरो)