Wednesday | Apr 22, 2026
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जनादेश का अपमान या राजनीति का पतन? प्रधानमंत्री पद पर अपशब्दों ने फिर खड़े किए बड़े सवाल

Raw File | 22 Apr 2026 | राजनीति, राष्ट्र

नई दिल्ली/ प्रधानमंत्री पद किसी एक व्यक्ति का पद नहीं होता, यह 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं, विश्वास और लोकतांत्रिक जनादेश का प्रतीक होता है। जब देश की जनता भारी बहुमत से किसी नेता को चुनकर देश की बागडोर सौंपती है, तब उस पद की गरिमा पूरे राष्ट्र की गरिमा बन जाती है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे वर्तमान के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के लिए अपमानजनक, असंसदीय और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग केवल राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि देश की जनता के फैसले का भी अपमान माना जाता है। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए “आतंकी” शब्द के प्रयोग ने राजनीतिक वातावरण को गरमा दिया है। भाजपा ने इसे लोकतंत्र और संवैधानिक पद की गरिमा पर हमला बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।

यह कोई पहली घटना नहीं है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ की गई हों। पिछले एक दशक में विरोध की राजनीति कई बार मर्यादा की सीमाएं लांघती दिखाई दी है। कभी उन्हें “चायवाला” कहकर छोटा दिखाने की कोशिश हुई, कभी “मौत का सौदागर” कहा गया, कभी “नीच राजनीति” जैसे शब्द बोले गए, तो कभी “चौकीदार चोर है” जैसे नारे गढ़े गए। हाल के वर्षों में “तानाशाह” और “लोकतंत्र के लिए खतरा” जैसी उपमाएं भी दी गईं। अब “आतंकी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह बताता है कि मुद्दों पर लड़ने की बजाय व्यक्तिगत हमले राजनीति का आसान रास्ता बनते जा रहे हैं।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, अर्थव्यवस्था, कानून व्यवस्था और नीतियों पर सवाल उठाना स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब बहस मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत अपमान तक पहुंच जाए, तब यह लोकतंत्र की मजबूती नहीं बल्कि उसकी कमजोरी का संकेत बन जाता है। जनता अब यह समझने लगी है कि जिनके पास मुद्दे कम होते हैं, वे अक्सर भाषा की तीखी राजनीति का सहारा लेते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीन बार राष्ट्रीय नेतृत्व सौंपा है। 2014, 2019 और 2024 में जनता ने उन्हें सबसे बड़े जनादेश के साथ स्वीकार किया। करोड़ों लोगों के समर्थन से चुने गए नेता के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग सीधे तौर पर उन मतदाताओं के निर्णय को भी कमतर आंकने जैसा है। यही कारण है कि जब-जब इस तरह की टिप्पणियाँ हुईं, जनता ने चुनाव में अपना जवाब भी दिया।

आज राजनीति में सोशल मीडिया, वायरल क्लिप्स और तात्कालिक सुर्खियों की होड़ ने भाषा का स्तर गिराया है। कई नेता मानते हैं कि जितना तीखा बोलेंगे, उतनी चर्चा होगी। लेकिन भारत का मतदाता अब परिपक्व है। वह शोर और शब्दों से ज्यादा काम, नेतृत्व, स्थिरता और विजन को महत्व देता है।

विरोध कीजिए, सरकार को घेरिए, सवाल पूछिए, लेकिन भाषा ऐसी हो जो लोकतंत्र को मजबूत करे। प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो या विपक्ष का कोई बड़ा नेता—हर संवैधानिक पद का सम्मान होना चाहिए। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मर्यादा टूटना खतरनाक है।

देश की राजनीति को अब व्यक्तिगत कटाक्ष से ऊपर उठकर मुद्दों पर लौटना होगा। क्योंकि शब्दों की आग कुछ पल सुर्खियां दे सकती है, लेकिन लंबे समय में वही लोकतंत्र के वातावरण को कमजोर करती है। जनता अब विकास की भाषा सुनना चाहती है, अपमान की नहीं।


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