रायपुर/ राजनीति में वैचारिक मतभेद होना लोकतंत्र का श्रृंगार है, लेकिन जब विरोध की भाषा अपनी मर्यादा की अंतिम सीमा को भी पार कर जाए, तो उसे राजनीति नहीं, ‘बौद्धिक दरिद्रता’ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के कूटनीतिक संबंधों पर जो ओछी और बेहद घटिया टिप्पणी की है, वह न केवल उनके व्यक्तिगत राजनीतिक चरित्र का पतन है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की शालीन संस्कृति पर एक गहरा तमाचा है।
राजनीतिक विमर्श का गिरता स्तर
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका एक पहरेदार की होती है। जनता उम्मीद करती है कि विपक्षी दल सरकार की विफलताओं, महंगाई और प्रशासनिक खामियों को तार्किक तरीके से उठाएगी। लेकिन, जब एक राष्ट्रीय पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गंभीर मंचों को ‘वेडिंग शूट’ या ‘हनीमून’ जैसा बताने लगे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी में अब तर्कों का अकाल है। यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस ‘विकृत मानसिकता’ का प्रकटीकरण है, जहाँ सत्ता से बाहर होने की हताशा अब व्यक्तिगत चरित्र हनन में बदल चुकी है।
अस्तित्व की लड़ाई या बौद्धिक दिवालियापन?
सवाल यह है कि क्या दीपक बैज के पास अब जनता के मुद्दों पर बात करने के लिए कोई ‘विज़न’ नहीं बचा है? वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती साख को ‘गॉसिप’ की तरह प्रस्तुत करना छत्तीसगढ़ के नेतृत्व की ओछी सोच को दर्शाता है। एक महिला प्रधानमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री की भेंट को जिस ‘अनैतिक चश्मे’ से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने देखा है, वह भारतीय संस्कृति की परंपराओं के कतई अनुरूप नहीं है। छत्तीसगढ़ की ‘अतिथि देवो भव:’ की संस्कृति ऐसी बयानबाजी की अनुमति नहीं देती।
कांग्रेस आलाकमान की चुप्पी: एक मौन समर्थन?
सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस आलाकमान की चुप्पी पर है। क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे दिग्गज नेता इस इस भाषा, इस टिप्पणी का समर्थन करते हैं? उनकी यह चुप्पी यह संकेत देती है कि शायद कांग्रेस की नई राजनीति का आधार ही अब ‘द्वेष’ और ‘व्यक्तिगत हमले’ बन चुके हैं।
छत्तीसगढ़ की जनता देख रही है।
छत्तीसगढ़ की जनता अब इस तमाशे से थक चुकी है। एक तरफ विष्णु देव साय की सरकार विकास के एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता अपनी कुर्सी बचाने और दूसरे की टांग खींचने के ‘दिवास्वप्न’ में उलझे हैं। दीपक बैज को यह समझना होगा कि गटर की राजनीति से न तो कोई बड़ा नेता बनता है और न ही पार्टी की खोई हुई जमीन वापस आती है।
राजनीति में वैचारिक मतभेद एक आभूषण है, लेकिन चरित्र हनन एक दाग है, जो स्थायी हो जाता है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह एक जिम्मेदार विपक्षी दल की तरह काम करेगी या ऐसे बयानों के जरिए अपनी बची-खुची साख को भी पूरी तरह मिटा देगी।