Thursday | Aug 06, 2026
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सरकारी विज्ञापन और मीडिया की अर्थव्यवस्था!

सरकारी विज्ञापनों पर सियासत करिए पर पत्रकारों का पक्ष भी समझिए!

रायपुर/ छत्तीसगढ़ विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने जनवरी 2024 से मार्च 2026 के बीच यानी सवा दो सालों में प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों पर ₹1,095 करोड़ से अधिक खर्च किए हैं। इस राशि में प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और फील्ड पब्लिसिटी पर किया गया व्यय शामिल है। इस खुलासे के बाद विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं और इसे फिजूलखर्ची बताया है।
लेकिन राजनीति में स्मृति अक्सर बहुत छोटी होती है।

वीडियो साभार – द लेंस एवं सीजी खबर
आज जो कांग्रेस वर्तमान सरकार के विज्ञापन खर्च को मुद्दा बना रही है, उसके अपने शासनकाल के दौरान भी विज्ञापन पर बड़े पैमाने पर सरकारी धन खर्च हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल के अंतिम सात महीनों में 750 करोड़ से ज्यादा खर्च किया गया। सीजी खबर के अनुसार उन 7 महीनों में सरकार औसतन प्रतिदिन लगभग ₹2.74 करोड़ विज्ञापनों पर खर्च कर रही थी। यही नहीं, विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में यह दावा भी सामने आया कि उनके पूरे कार्यकाल में संवाद एवं जनसंपर्क विभाग के माध्यम से लगभग ₹3,000 करोड़ खर्च किए गए। फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स), डिजिटल प्लेटफॉर्म, राष्ट्रीय मीडिया, यहां तक कि नेपाली टेलीविजन चैनलों और दिल्ली एयरपोर्ट पर लगे विज्ञापन भी उस समय चर्चा का विषय रहे। इसमें मजेदार बात ये भी है कि चुनावी वर्ष के सरकारी प्रचार की ज्यादातर राशि का मीडिया को भुगतान आने वाली सरकार करती है। जैसे डॉ रमन सिंह के कार्यकाल के लगभग 100 करोड़ का भुगतान भूपेश बघेल के कार्यकाल में हुआ उसी तरह भूपेश बघेल की सरकार का लगभग सवा करोड़ भुगतान विष्णुदेव साय की सरकार में हुआ।

यदि इन तथ्यों को साथ रखकर देखा जाए तो स्पष्ट है कि विज्ञापन केवल किसी एक सरकार की नीति नहीं रही हैं। सत्ता में चाहे कोई भी दल रहा हो, हर सरकार ने अपनी योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए विज्ञापन का सहारा लिया है। इसलिए बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि किसने कितना खर्च किया, बल्कि इस पर होनी चाहिए कि खर्च कितना पारदर्शी, न्यायसंगत और जनहितकारी था।

लेकिन इस पूरी बहस का एक पक्ष ऐसा है, जिसकी चर्चा सबसे कम होती है। पत्रकारों और मीडिया कर्मियों का पक्ष।
सरकारी विज्ञापन केवल सरकार का प्रचार नहीं हैं। यही विज्ञापन प्रदेश के सैकड़ों समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, क्षेत्रीय चैनलों, डिजिटल पोर्टलों और हजारों श्रमजीवी पत्रकारों की आर्थिक रीढ़ भी हैं। इन्हीं से रिपोर्टरों का मानदेय निकलता है, फोटोग्राफरों को काम मिलता है, कैमरामैन, वीडियो एडिटर, डिज़ाइनर, प्रिंटिंग प्रेस, वितरण व्यवस्था और मीडिया संस्थानों से जुड़े हजारों परिवारों का घर चलता है।

यह भी याद रखना चाहिए कि पत्रकार भी इसी समाज के नागरिक हैं। उनका भी परिवार है, बच्चों की शिक्षा है, स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं हैं और जीवनयापन की चुनौतियां हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों से हर दिन जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उनके प्रति सरकार और समाज की जिम्मेदारियों पर बहुत कम चर्चा होती है।

सरकारें किसानों, महिलाओं, युवाओं, विद्यार्थियों, मजदूरों, उद्योगों और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करती हैं। यह आवश्यक भी है। लेकिन पत्रकारों के कल्याण पर होने वाला प्रत्यक्ष खर्च इसकी तुलना में बहुत सीमित है या यू कहे न के बराबर है। ऐसे में सरकारी विज्ञापन केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि मीडिया उद्योग की आर्थिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण आधार भी बन जाते हैं।

परंतु इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि विज्ञापन बिना नियमों के बांटे जाएं। सरकार का दायित्व है कि विज्ञापन वितरण पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और समान अवसर के सिद्धांत पर आधारित हो। किसी मीडिया संस्थान को उसकी विचारधारा या सरकार के प्रति उसके रुख के आधार पर न पुरस्कृत किया जाए और न ही दंडित। छोटे और मध्यम समाचार पत्रों, ग्रामीण पत्रकारिता और क्षेत्रीय मीडिया को भी न्यायसंगत अवसर मिलना चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार की योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाना भी आवश्यक है और सरकार से सवाल पूछना भी उतना ही आवश्यक है। इन दोनों जिम्मेदारियों के बीच पत्रकारिता एक सेतु का काम करती है। यदि पत्रकारिता आर्थिक रूप से कमजोर होगी तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा।

इसलिए सरकारी विज्ञापनों पर होने वाली बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि विज्ञापन नीति कैसी हो, पत्रकारों का भविष्य कैसे सुरक्षित हो और मीडिया संस्थानों को निष्पक्ष अवसर कैसे मिले।

सरकारें बदलती रहेंगी, विपक्ष भी बदलता रहेगा। लेकिन पत्रकारिता लोकतंत्र का स्थायी स्तंभ है। मजबूत सरकारें लोकतंत्र को चलाती हैं, जबकि मजबूत और स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र को जीवित रखती है। इसलिए विज्ञापन पर राजनीति कीजिए, लेकिन पत्रकारिता के पक्ष को भी नजरअंदाज मत कीजिए।

(देवेंद्र किशोर गुप्ता)


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