Wednesday | Jul 08, 2026
The Raw File

कोरिया हत्याकांड : न्याय चाहिए, जातीय उन्माद नहीं !

पीड़ित परिवार के साथ खड़ा है संपूर्ण छत्तीसगढ़

रायपुर/ बीते दिनों हुई कोरिया की घटना ने पूरे छत्तीसगढ़ को झकझोर दिया है। चार लोगों को जिंदा जलाकर मार देना किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। इस अपराध के दोषियों के प्रति न सहानुभूति हो सकती है और न ही किसी प्रकार की नरमी। उन्हें कानून के तहत कठोर से कठोर सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस अपराध को जातीय संघर्ष का रंग देकर न्याय मिलेगा?

स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारियों और चर्चाओं के अनुसार विवाद दो परिवारों के बीच कारोबारी वर्चस्व और निजी दुश्मनी का था। आरोप यह भी रहे हैं कि दोनों पक्ष रेत के कारोबार से जुड़े थे और इसी वर्चस्व की लड़ाई ने भयावह रूप ले लिया। यह लड़ाई इसलिए नहीं थी कि एक पक्ष ब्राह्मण था और दूसरा ठाकुर। इसलिए पूरे घटनाक्रम को “ब्राह्मण बनाम ठाकुर” बनाकर पेश करना बेहद राजनैतिक मानसिकता को प्रदर्शित करता है।

घटना के बाद पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच आगे बढ़ रही है। कानून अपना काम कर रहा है। मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल स्वयं पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे, उनका दर्द सुना और वहीं से मुख्यमंत्री से फोन पर पीड़ित परिवार की बातचीत भी कराई। इस दौरान मुख्यमंत्री ने परिवार के प्रति सहानुभूति जताते हुए उन्हें न्याय दिलाने की बात कही। प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने भी स्पष्ट किया है कि दोषियों के खिलाफ मजबूत साक्ष्य जुटाकर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

फिर भी कथित करणी सेना के कुछ नेताओं द्वारा इस मामले को जातीय आंदोलन का रूप देने की कोशिश समझ से परे है। राज शेखावत और वीरेंद्र तोमर के नेतृत्व में 29 जून को न्याय यात्रा की घोषणा, देशभर से लोगों को बुलाने की अपील और बैनर-पोस्टरों में “सवर्ण समाज” को विशेष रूप से लामबंद करने की कोशिश आखिर किस उद्देश्य से है? क्या छत्तीसगढ़ का बाकी समाज पीड़ित परिवार के साथ नहीं है?

आज दलित भी न्याय चाहता है, आदिवासी भी न्याय चाहता है, पिछड़ा वर्ग भी न्याय चाहता है, ब्राह्मण, बनिया भी न्याय चाहता है और ठाकुर समाज भी न्याय चाहता है। पूरा छत्तीसगढ़ एक स्वर में कह रहा है कि एक परिवार को तबाह कर देने वाले हत्यारों को फांसी जैसी कठोर सजा मिले। फिर भी कुछ लोगों द्वारा समाज को बांटने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?

अगर पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी होती, आरोपी खुले घूम रहे होते या सरकार मौन होती, तब जनदबाव की बात समझ में आती। लेकिन जब 11 दिनों के भीतर 12 आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, सरकार सक्रिय है और न्यायिक प्रक्रिया चल रही है, तब जातीय भावनाएं भड़काने की राजनीति आखिर किसके हित में है?

करणी सेना यदि वास्तव में पीड़ित परिवार के साथ खड़ी होना चाहती है, तो उन्हें कानूनी सहायता दे, मुकदमे की पैरवी में सहयोग करे, परिवार का मनोबल बढ़ाए। लेकिन न्याय के नाम पर झंडा, डंडा और भीड़ की राजनीति करके छत्तीसगढ़ की सामाजिक एकता को दांव पर लगाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

यह मत भूलिए कि हत्या का दर्द एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार जीवनभर झेलता है। इसलिए पीड़ित परिवार को राजनीति का मंच नहीं, न्याय का सहारा मिलना चाहिए।

छत्तीसगढ़ की पहचान सामाजिक सौहार्द है। यहां जाति के नाम पर नफरत की खेती करने वालों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को केवल हत्यारों पर ही नहीं, बल्कि जातीय उन्माद फैलाकर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश करने वालों पर भी कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

कोरिया की इस दुखद घटना पर हर छत्तीसगढ़िया को न्याय चाहिए…लेकिन न्याय के नाम पर समाज को बांटने की इजाजत किसी को नहीं देनी चाहिए।

🟠 देवेंद्र किशोर गुप्ता


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