देश का लोकतंत्र आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, उनका नेतृत्व मजबूत हो रहा है, और हर क्षेत्र में वे अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही हैं। पंचायत से संसद तक, न्यायपालिका से सेना तक, शिक्षा से उद्योग जगत तक महिलाएं नई इबारत लिख रही हैं। ऐसे दौर में यदि कोई जनप्रतिनिधि महिलाओं की मेहनत, संघर्ष और उपलब्धियों को अपमानजनक नजरिये से देखे, तो यह केवल एक बयान नहीं बल्कि पूरे समाज की गरिमा पर हमला माना जाएगा।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)
रायपुर/बिहार के पूर्णिया सांसद पप्पू यादव के महिलाओं को लेकर दिए गए कथित विवादित बयान ने यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कुछ नेताओं की सोच आज भी इतनी पिछड़ी और दूषित क्यों है। महिलाओं के आरक्षण और राजनीति में भागीदारी जैसे गंभीर विषय पर जिस तरह की टिप्पणी सामने आई, उसने राजनीतिक मर्यादा, सामाजिक संवेदनशीलता और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। यही कारण है कि बिहार राज्य महिला आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह कार्रवाई बताती है कि अब समाज महिलाओं के सम्मान पर किसी भी प्रकार की चोट को हल्के में लेने को तैयार नहीं है।
यह समझना जरूरी है कि राजनीति किसी की निजी जागीर नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को आगे बढ़ने, चुनाव लड़ने, नेतृत्व करने और नीति निर्माण में भाग लेने का समान अधिकार है। महिलाएं आज किसी की कृपा से नहीं, बल्कि अपनी योग्यता, मेहनत और संघर्ष के दम पर आगे बढ़ रही हैं। देश ने इंदिरा गांधी जैसी प्रधानमंत्री देखी, सुषमा स्वराज जैसी प्रभावशाली विदेश मंत्री देखी, निर्मला सीतारमण जैसी मजबूत वित्त मंत्री देखी, ममता बनर्जी जैसी जननेता देखी, और हजारों ऐसी महिला जनप्रतिनिधि देखी हैं जिन्होंने जमीन से उठकर अपनी पहचान बनाई। इन सभी उपलब्धियों को यदि कोई व्यक्ति अपमानजनक टिप्पणी से जोड़ने की कोशिश करता है, तो वह महिलाओं का नहीं बल्कि अपने संस्कारों और मानसिकता का परिचय देता है।
दुखद बात यह है कि ऐसे बयान अक्सर वही लोग देते हैं जो जनता के वोट से संसद या विधानसभा तक पहुंचते हैं। जनता उन्हें इसलिए चुनती है कि वे समाज की आवाज बनें, विकास की बात करें, समस्याओं का समाधान दें और लोकतंत्र की गरिमा बढ़ाएं। लेकिन जब कोई सांसद महिलाओं को लेकर सड़कछाप भाषा और घटिया सोच का प्रदर्शन करता है, तो जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। संसद की कुर्सी केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। वहां बैठने वाला व्यक्ति शब्दों का महत्व समझे, सामाजिक प्रभाव समझे और संवैधानिक मर्यादा का पालन करे, यही अपेक्षा होती है।
आज देश की महिलाएं केवल वोटर नहीं हैं, वे नीति निर्धारक भी हैं। वे परिवार संभाल रही हैं, कारोबार चला रही हैं, प्रशासनिक सेवाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, सेना में सीमा पर तैनात हैं, विज्ञान और तकनीक में नए आयाम गढ़ रही हैं। ऐसे समय में महिलाओं को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करना दरअसल उस नई शक्ति से डर और असहजता का संकेत है जो तेजी से उभर रही है। कुछ लोगों को यह स्वीकार करने में दिक्कत होती है कि महिलाएं अब पीछे रहने वाली नहीं हैं। इसलिए वे कभी तंज कसते हैं, कभी चरित्र पर चोट करते हैं, कभी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत बदल चुका है और महिलाओं की शक्ति को अब कोई रोक नहीं सकता।
महिला आयोग द्वारा नोटिस जारी करना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन केवल नोटिस पर्याप्त नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में सार्वजनिक माफी, राजनीतिक दलों की स्पष्ट प्रतिक्रिया और भविष्य के लिए कठोर संदेश भी जरूरी है। यदि राजनीतिक दल केवल वोट बैंक देखकर चुप रहेंगे, तो यह मौन भी अपराध माना जाएगा। महिलाओं के सम्मान पर दोहरा रवैया अब नहीं चल सकता। यदि किसी विरोधी दल का नेता ऐसा बयान दे तो शोर मचाना और अपने दल का नेता कहे तो चुप रहना यह राजनीति जनता समझती है।
समाज को भी अब यह तय करना होगा कि वह ऐसे नेताओं को मंच देगा या नहीं। महिलाओं का अपमान करने वालों को ताली नहीं, जवाब मिलना चाहिए। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है, और जनता समय आने पर अहंकार, अभद्रता और दूषित सोच का हिसाब करती है। महिलाओं का सम्मान केवल भाषणों का विषय नहीं, राष्ट्र निर्माण की बुनियादी शर्त है। जिस समाज में नारी का सम्मान नहीं होता, वहां विकास केवल नारों में रह जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति में भाषा का स्तर सुधरे, नेतृत्व में संवेदनशीलता आए और महिलाओं के प्रति सम्मान व्यवहार में दिखे। भारत की महिलाएं किसी की दया पर नहीं, अपनी ताकत पर आगे बढ़ी हैं और आगे भी बढ़ती रहेंगी। जो लोग उन्हें कमतर आंकते हैं, वे इतिहास के हाशिए पर चले जाएंगे। यह नया भारत है, यहाँ महिलाएं अवसर नहीं मांगतीं, अवसर बनाती हैं। इसलिए जो नेता महिलाओं पर कीचड़ उछालते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि कुर्सी जनता देती है और सम्मान संस्कार देते हैं। कुर्सी मिल सकती है, संस्कार नहीं।