उच्च शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ के गलियारों में इस समय चल रही बहस नियुक्तियों की नहीं, नियंत्रण की है। हाल ही में राजभवन के एक निर्देश के बाद यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि विश्वविद्यालयों की बागडोर आखिर किसके हाथ में रहेगी निर्वाचित मंत्री के या संवैधानिक कुलाधिपति के?
रायपुर/ छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक प्रशासनिक पत्र के कारण राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। राजभवन से जारी निर्देश में विश्वविद्यालयों में कुलसचिव अथवा प्रभारी कुलसचिव की नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति या पदस्थापन से पहले कुलाधिपति की अनुमति पर बात कही गई गई है। इतना ही नहीं, शिक्षकों, अधिकारियों या कर्मचारियों के विरुद्ध किसी जांच के बाद अंतिम निर्णय लेने से पहले भी कुलाधिपति से अनुमोदन लेने की बात कही गई है। एक बार आप इस पत्र का अवलोकन कीजिए…⬇️

राज्यपाल रमन डेका पदेन कुलाधिपति हैं, जबकि उच्च शिक्षा विभाग का दायित्व मंत्री टंकराम वर्मा के पास है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है क्या यह विश्वविद्यालय प्रशासन में संतुलन है या मंत्री के अधिकारों की सीमारेखा पर नई लकीर?
संविधान के तहत राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं, लेकिन कार्यपालिका का संचालन मंत्रिपरिषद करती है। वहीं राज्य विश्वविद्यालय अधिनियमों में राज्यपाल को कुलाधिपति के रूप में विशिष्ट शक्तियाँ दी जाती हैं। यहीं से अधिकारों की व्याख्या का क्षेत्र धुंधला हो जाता है। यदि हर नियुक्ति और अनुशासनात्मक निर्णय से पहले कुलाधिपति की अनुमति आवश्यक हो, तो उच्च शिक्षा विभाग की प्रशासनिक स्वायत्तता कितनी बचेगी? और यदि अनुमति न हो, तो क्या विश्वविद्यालय राजनीतिक प्रभाव में आ जाएंगे? बहस दोनों ओर से तीखी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि देश के कई राज्यों में विश्वविद्यालय नियुक्तियों को लेकर राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव की स्थितियाँ बनी हैं। छत्तीसगढ़ में भी अब वही संकेत दिखाई दे रहे हैं। विपक्ष इसे “संवैधानिक संतुलन” बता सकता है, तो सत्तारूढ़ पक्ष इसे “प्रशासनिक दखल” कह सकता है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि विश्वविद्यालयों का संचालन आखिर किसके प्रति जवाबदेह होगा निर्वाचित सरकार के प्रति या संवैधानिक पद पर आसीन कुलाधिपति के प्रति?
उच्च शिक्षा मंत्री के अधिकार सामान्यतः विभागीय प्रशासन, नियुक्ति प्रक्रिया और अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े होते हैं। यदि प्रत्येक निर्णय दोहरी स्वीकृति के दायरे में आएगा, तो निर्णय प्रक्रिया धीमी होने और जिम्मेदारी के बिखरने का खतरा भी रहेगा। वहीं राजभवन का तर्क यह हो सकता है कि विश्वविद्यालयों की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह निगरानी आवश्यक है। सवाल यह है कि क्या निगरानी और नियंत्रण के बीच संतुलन साधा गया है, या यह व्यवस्था एक समानांतर शक्ति केंद्र की छवि बना रही है?
राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि शिक्षा का क्षेत्र सीधे युवाओं और भविष्य की नीति से जुड़ा है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन अधिकार-सीमा की खींचतान में उलझता है, तो उसका असर छात्रों, शिक्षकों और शोध गतिविधियों पर पड़ सकता है। जनता की नजर में यह केवल संवैधानिक तकनीकी मामला नहीं है; यह शासन की स्पष्टता और जवाबदेही का सवाल है।
यह भी याद रखना होगा कि राज्यपाल का पद गरिमा और संवैधानिक दायित्व से जुड़ा है, जबकि मंत्री लोकतांत्रिक जनादेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि दोनों के अधिकारों की रेखाएँ स्पष्ट न हों, तो राजनीतिक व्याख्याएँ हावी हो जाती हैं। इसलिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय अधिनियम और प्रशासनिक प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए, ताकि न तो मंत्री के अधिकारों का अतिक्रमण हो और न ही कुलाधिपति की संवैधानिक भूमिका कमजोर पड़े।
फिलहाल यह मामला एक पत्र से शुरू हुआ है, लेकिन इसके संकेत व्यापक हैं। यह केवल नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य में शक्ति-संतुलन की परिभाषा का प्रश्न बनता जा रहा है। अब देखना यह है कि यह संवाद से सुलझता है या आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और कानूनी व्याख्या का विषय बनता है। छत्तीसगढ़ की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए यह एक निर्णायक क्षण हो सकता है।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता)