Sunday | Jun 21, 2026
The Raw File

जेल गए सहयोगी, अब ‘ऑफर’ की कहानी? भूपेश के दावे पर उठे कई सवाल”

“सत्ता में घोटाले, सत्ता से बाहर साजिश! किस पर यकीन करे जनता?”

रॉ फाइल ब्यूरो/ वरिष्ठ कांग्रेस नेता और देश के जाने माने वकील कपिल सिब्बल के पॉडकास्ट में भूपेश बघेल ने जैसे ही यह दावा किया कि उन्हें भाजपा में शामिल होने का “ऑफर” दिया गया, दिल्ली बुलाया गया और कमिटमेंट न करने पर छापे शुरू हो गए। इस बात से प्रदेश का राजनीतिक तापमान अचानक से बढ़ गया और चर्चाओं का एक नया दौर शुरू हो गया। लेकिन यह बयान हमें जितना सनसनीखेज लगा, उतना ही सवाल भी अपने साथ लेकर आया। क्या यह सचमुच सत्ता का दबाव था, या फिर अपने शासनकाल पर लगे गंभीर आरोपों से ध्यान हटाने की रणनीति? जब कार्यकाल के दौरान करीबी अधिकारी और सहयोगी जांच एजेंसियों के शिकंजे में आते रहे हों, तब अचानक सामने आया यह दावा संयोग कम और सियासी प्रतिरोध की नई पटकथा ज्यादा प्रतीत होता है। जनता अब भावनात्मक कथाओं से आगे बढ़ चुकी है वह प्रमाण, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है।

भूपेश बघेल अपने कार्यकाल को जनहितकारी और किसान-केंद्रित बताते रहे हैं, लेकिन उनके शासनकाल पर लगे आरोपों का दायरा छोटा नहीं था। कथित शराब घोटाला, कोयला लेवी वसूली, और अन्य आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग की कार्रवाई ने कई वरिष्ठ अधिकारियों और करीबी सहयोगियों को जेल तक पहुंचाया। सबसे चर्चित नाम रहा उनकी ओएसडी रहीं सौम्या चौरसिया का, जिन्हें लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा। कई आईएएस अधिकारी, कारोबारी और कथित लाइजनर भी जांच एजेंसियों के शिकंजे में आए। राजनीतिक रूप से यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह अनभिज्ञ था, तो इतने व्यापक स्तर पर कथित गड़बड़ियां कैसे चलती रहीं?
यहां यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है और भारतीय राजनीति में एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि किसी भी सरकार की विश्वसनीयता उसके सहयोगियों के आचरण से भी तय होती है। यदि एक के बाद एक करीबी लोग गंभीर मामलों में गिरफ्तार होते हैं, तो केवल “राजनीतिक साजिश” कहकर पूरा विमर्श खारिज करना आसान तो है, पर संतोषजनक नहीं।
पॉडकास्ट में मोदी-शाह का नाम लेकर लगाए गए आरोप राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से प्रभावी हो सकते हैं, परंतु इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि उनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक तंत्र में क्या हुआ। क्या निगरानी कमजोर थी? क्या राजनीतिक संरक्षण का आरोप निराधार है? क्या सरकार के भीतर जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावी थी? इन सवालों का उत्तर भावनात्मक बयान से नहीं, दस्तावेजी और न्यायिक प्रक्रिया से मिलेगा।
राजनीति में “ऑफर” और “दबाव” की कहानियां नई नहीं हैं। लेकिन जब किसी पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारी, सलाहकार और सहयोगी जेल में रहे हों, तब खुद को पूरी तरह पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना जनता के लिए सहज स्वीकार्य नहीं होता। जनता अंततः यह देखती है कि शासनकाल में पारदर्शिता कितनी थी और जवाबदेही कितनी तय हुई। बयान राजनीति का हिस्सा हैं, पर विश्वसनीयता तथ्यों और परिणामों से बनती है।


Raw File



संबंधित खबरें