रायपुर/स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिनाई गई उपलब्धियां कागज़ पर भले ही बड़ी दिखती हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत उनसे बिल्कुल उलट है। उनकी घोषणाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सब कुछ इतना ही बेहतर है, तो सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी और बदहाली साफ तौर पर क्यों दिखाई दे रही है? यह सब उनके व्यक्तिगत भ्रष्टतंत्र के कारनामों की वजह से है। प्रवेश की संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था कमीशनखोरी की भेंट चढ़ चुकी है। यह विभाग भ्रष्टाचार में कीर्तिमान गढ़ते आ रहा है।
प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वार्डों में अव्यवस्था, दवाइयों की कमी, मशीनों का खराब होना और स्टाफ की भारी कमी आम बात हो चुकी है। हालात यह हैं कि मरीजों और उनके परिजनों का भरोसा लगातार सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से उठता जा रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति अमानक दवाओं को लेकर है। सरकारी अस्पतालों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि दी जा रही दवाइयों की गुणवत्ता संदिग्ध है। इन शिकायतों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि अब लोगों को सरकारी अस्पताल में इलाज कराने से डर लगने लगा है।
दवा व्यवस्था पर मंत्री जी की चुप्पी सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है। 9M दवा कंपनी की दवाइयों को लेकर बार-बार शिकायतें सामने आईं, बावजूद इसके न तो कंपनी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही सप्लाई रोकी गई। यही नहीं, सरकारी अस्पतालों में लगभग 80 प्रतिशत दवाइयाँ एक ही कंपनी की मिल रही हैं। यह सीधा संकेत है कि स्वास्थ्य विभाग में दवा सप्लाई एकाधिकार और कमीशन सिस्टम के भरोसे चल रही है। अगर मंत्री वास्तव में सुधार चाहते हैं, तो इस एकाधिकार पर आज तक चुप क्यों हैं?
अस्पतालों में ब्रांडेड और प्रमाणित दवाइयों की जगह स्थानीय स्तर पर सप्लाई की गई संदिग्ध गुणवत्ता वाली दवाइयाँ दी जा रही हैं। नतीजा यह है कि इलाज के बाद भी मरीज ठीक नहीं हो रहे और बाहर से महंगी दवाइयाँ खरीदने को मजबूर हैं। मंत्री 642 करोड़ की दवा खरीदी का दावा करते हैं, लेकिन अस्पतालों की वास्तविक स्थिति इन दावों की पोल खोल देती है।
भ्रष्टाचार की तस्वीर और भी गंभीर है। CGMSC से जुड़े हजारों करोड़ के घोटालों में कुछ कर्मचारियों को जेल भेजकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जबकि बड़े अफसर और IAS अधिकारी आज भी बाहर हैं। यह साफ दर्शाता है कि कार्रवाई सिर्फ छोटे लोगों तक सीमित है, असली जिम्मेदारों तक हाथ नहीं पहुंच रहा। अगर स्वास्थ्य मंत्री की नीयत साफ होती, तो वे खुद आगे बढ़कर विभाग में गड़बड़ी करने वालों को जेल भेजने की पहल करते।
अस्पतालों के लिए सामग्री और उपकरणों की खरीद में मनमाने रेट लगाए जा रहे हैं। बाज़ार से कई गुना महंगे दामों पर सामान खरीदा जा रहा है और इस खुली लूट पर कोई जवाबदेही तय नहीं की जा रही। दवाइयों की कमी की शिकायतें रोज़ सामने आती हैं, फिर भी मंत्री मंच से उपलब्धियों की सूची पढ़ते रहते हैं।
108 एंबुलेंस सेवा की बदहाली पर हाई कोर्ट कई बार सरकार को फटकार लगा चुका है, इसके बावजूद सेवा में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। एंबुलेंस देर से पहुंचती हैं, कई जगह तो पहुंचती ही नहीं। आयुष्मान योजना का हाल भी इससे अलग नहीं है। अस्पतालों को समय पर भुगतान न होने की शिकायत डॉक्टर और प्रबंधन लगातार करते आए हैं, जिससे मरीजों को इलाज से वंचित होना पड़ रहा है।
कुल मिलाकर, स्वास्थ्य मंत्री के दावे और अस्पतालों की सच्चाई के बीच गहरी खाई है। आंकड़ों से प्रेस कॉन्फ्रेंस सज सकती है, लेकिन जब तक अमानक दवाओं, भ्रष्टाचार, बदइंतजामी और जवाबदेही की कमी पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था यूं ही बदहाल बनी रहेगी। आज स्थिति यह है कि सरकारी अस्पतालों से लोगों का भरोसा टूट रहा है और यही किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत है।