Wednesday | Apr 22, 2026
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संघ सरकार का बड़ा संदेश: कट्टर वामपंथी वी. एस. अच्युतानंदन को पद्म विभूषण

“मोदी सरकार द्वारा वामपंथी वी. एस. अच्युतानंदन
को पद्म विभूषण सम्मान देने की घोषणा केवल एक व्यक्ति को सम्मानित करने का फैसला नहीं है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में एक नई परंपरा की शुरुआत है। जहां वैचारिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक जीवन में दिए गए योगदान को मान्यता दी जा रही है। यह संदेश भी दिया जा रहा है कि राष्ट्रीय सम्मान पर किसी एक विचारधारा का आधिपत्य नहीं हैं।”

दिल्ली/पद्म पुरस्कारों की चर्चा देशभर में हो रही है। लेकिन इसी सूची में एक ऐसा नाम भी शामिल है जिस पर अपेक्षित विमर्श अब तक नहीं दिखता। यह नाम है केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ वामपंथी नेता वी. स्व. एस. अच्युतानंदन का। जिन्हें केंद्र सरकार ने पद्म विभूषण सम्मान देने की घोषणा की है। यह फैसला कई अर्थों में असाधारण है, क्योंकि यह सम्मान एक ऐसी सरकार द्वारा घोषित किया गया है जिसे वैचारिक रूप से दक्षिणपंथी माना जाता है। और सम्मान पाने वाला नेता भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का स्तंभ रहा है।
वी. एस. अच्युतानंदन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं। 1964 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर भाकपा (मार्क्सवादी) की स्थापना में भूमिका निभाई। उनका पूरा राजनीतिक जीवन संघर्ष, टकराव और सिद्धांतों पर अडिग रहने की मिसाल रहा है। 2006 से 2011 तक वे केरल के मुख्यमंत्री रहे और 82 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री बनने वाले देश के पहले नेता बने।
मुख्यमंत्री रहते हुए अच्युतानंदन ने जिस तरह के फैसले लिए वह क्रांतिकारी थे। वर्ष 2007 में उन्होंने अतिक्रमण हटाने का सघन अभियान चलाया और मुन्नार हिल स्टेशन क्षेत्र में लगभग 16 हजार एकड़ सरकारी जमीन को मुक्त कराया। इस अभियान की सबसे अहम बात यह रही कि इसमें राजनीतिक मित्र और सहयोगी दलों को भी नहीं बख्शा गया। सरकारी जमीन पर बने सहयोगी दल CPI के कार्यालय को भी गिराया गया। पाँच सितारा ‘क्लाउड नाइन’ जैसे रिसॉर्ट्स पर भी कार्रवाई हुई। यहां तक कि एक चर्च परिसर में लगे 30 फीट ऊंचे क्रॉस को अवैध मानते हुए हटाया गया, जिससे उस समय की राजनीतिक सत्ता, विशेषकर वर्तमान मुख्यमंत्री पीनाराई विजयन, उनसे खुलकर नाराज़ हुए।
यही नहीं, जब अच्युतानंदन ने ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ से प्रभावित परिवारों को सहायता देने की बात कही, तब पूरा वामपंथी इकोसिस्टम उनके विरुद्ध खड़ा हो गया। इसके बाद उन्हें न तो चुनाव का टिकट दिया गया और न ही पार्टी के शीर्ष संगठन पोलितब्यूरो में जगह मिली। एक तरह से उन्हें सक्रिय राजनीति के केंद्र से बाहर कर दिया गया।
विडंबना यह है कि आज, जब केरल की राजनीति में भ्रष्टाचार, सत्ता-केंद्रित फैसलों और तुष्टिकरण को लेकर स्वयं वामपंथी समर्थकों के भीतर असंतोष है। तब बड़ी संख्या में लोग अच्युतानंदन की निष्पक्ष, कठोर और निर्भीक कार्यशैली को याद कर रहे हैं। जिन मुद्दों पर वे कभी पार्टी लाइन से अलग खड़े दिखे, वही मुद्दे आज जनचर्चा का हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा उन्हें पद्म विभूषण सम्मान देने की घोषणा केवल एक व्यक्ति को सम्मानित करने का फैसला नहीं है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतीक है जहां वैचारिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक जीवन में दिए गए योगदान को मान्यता दी जाती है। यह संदेश जाता है कि राष्ट्रीय सम्मान किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि जिस सम्मान को लेकर वामपंथी दलों में अतीत में संकोच और अस्वीकार की प्रवृत्ति रही है, उसी वामपंथ की ओर से इस बार कोई तीखा विरोध सामने नहीं आया है। यह बदलाव भी समय के साथ राजनीतिक परिपक्वता का संकेत देता है।
वी. एस. अच्युतानंदन को पद्म विभूषण देने की घोषणा को अगर व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो यह एक सकारात्मक पहल और स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का उदाहरण है जहां विरोधी विचारधारा का सम्मान भी राष्ट्र की मजबूती माना जाता है। यह फैसला बताता है कि अंततः विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन ईमानदार सार्वजनिक जीवन और निडर प्रशासन इतिहास में सम्मान के पात्र बनते हैं।


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