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भारत में अगर सोशल मीडिया पर टैक्स लगा तो यह आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि डिजिटल बेरोज़गारी का सरकारी ऐलान होगा

Raw File | 15 Jan 2026 | राष्ट्र, विचार

Rawfile/अमेरिका के टैरिफ दबाव के बाद देश में कुछ लोग अचानक “देशभक्ति” का झंडा उठाकर सुझाव देने लगे हैं कि भारत को भी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर टैक्स लगा देना चाहिए। सुनने में यह बात बड़ी राष्ट्रवादी लगती है जैसे विदेशी कंपनियों की जेब काटकर देश का खजाना भर जाएगा। लेकिन असलियत यह है कि अगर ऐसा फैसला होता है तो गाज विदेशी कंपनियों पर नहीं बल्कि भारत के उन करोड़ों युवाओं पर गिरेगा जो नौकरी नहीं मिलने के बाद मोबाइल को ही अपनी कमाई का साधन बना चुके हैं। यह टैक्स “आर्थिक सुधार” नहीं होगा, यह बेरोज़गारों के हाथ से आखिरी सहारा छीनने की सरकारी कोशिश होगी।

भारत में सोशल मीडिया कोई एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री नहीं रह गई है, यह अब गरीब-निम्न मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा रोजगार केंद्र बन चुका है। YouTube, Instagram, Facebook जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आज करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में कमा रहे हैं। कोई वीडियो बनाकर, कोई एडिटिंग करके, कोई रिपोर्टिंग करके, कोई शॉप का प्रमोशन करके, कोई रील बनाकर तो कोई फ्रीलांस काम करके। इनमें शहरों के ही नहीं गांव, छोटे कस्बों के लड़के लड़कियां,महिलाएं, कलाकार, बेरोज़गारी से जूझते पढ़े-लिखे युवा भी हैं और बहुत से ऐसे पत्रकार भी है जिनके लिए सोशल मीडिया शौक नहीं रोजगार का साधन है।

लेकिन देश के कुछ ज्ञानचंदों को लगता है कि जिस चीज़ से आम आदमी दो वक्त की रोटी जुटा रहा है, उसी पर “टैक्स की छुरी” चलाकर राजस्व का जादू हो जाएगा।
सोशल मीडिया टैक्स के समर्थक जिस तरह यह भ्रम बेच रहे हैं कि इससे Google और Meta जैसी विदेशी कंपनियां पैसे भरेंगी, यह या तो पूरी तरह नासमझी है या फिर जनता को मूर्ख बनाने का सोचा-समझा खेल। ये कंपनियां टैक्स अपनी जेब से नहीं देतीं, वे टैक्स का बोझ क्रिएटर्स के सिर पर पटक देती हैं। पहले विज्ञापन दरें घटेंगी, फिर मोनेटाइजेशन की शर्तें कड़ी होंगी, फिर पेआउट कटेगा, फिर पहुंच (reach) कम होगी और अंत में वही क्रिएटर भूखा रहेगा जिसे “डिजिटल इंडिया” का पोस्टर बॉय बनाकर फोटो खिंचवा ली जाती है। टैक्स सरकार ले जाएगी और कटौती जनता भुगतेगी। इससे बड़ा सीधा धोखा और क्या होगा।

और फिर कुछ लोग अमेरिका का नाम लेकर ज्ञान बाँटते हैं कि “अमेरिका ने किया तो भारत क्यों नहीं।” भाई, अमेरिका में सोशल मीडिया कमाई अक्सर एक्स्ट्रा इनकम होती है, भारत में यह घर की रोटी होती है। वहां गिरने वाला क्रिएटर सामाजिक सुरक्षा में संभल जाता है, यहां गिरा तो सीधे बेरोज़गारी की कब्र में। वहां सिस्टम सहारा देता है, यहां सिस्टम सिर्फ भाषण देता है। इसलिए अमेरिका की तुलना करना वैसा ही है जैसे रेगिस्तान में बर्फ की खेती करने की सलाह दे देना।

इस बहस में एक सवाल जानबूझकर दबा दिया जाता है। टैक्स से जो पैसा आएगा, वो जाएगा कहां? देश में पहले से वसूले जा रहे करों का हाल तो जनता देख ही रही है। प्रत्येक सरकारी योजना में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। राज्य सरकार हेतु टैक्स के पैसे को खैरात में बांट रही है। योजनाओं की फाइलें भारी हैं और जमीन पर नतीजा शून्य है। हर साल हजारों करोड़ की राशि भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और लापरवाही में निपट जाती है। ऐसे में सोशल मीडिया टैक्स का पैसा भी उसी “सिस्टम के पेट” में जाएगा, यही सबसे बड़ा डर है। जनता पूछती है—टैक्स की मार हम झेलें, और मलाई कौन खाएगा?
डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के नारे तब तक खोखले हैं जब तक डिजिटल रोजगार को सुरक्षा नहीं मिलती। सोशल मीडिया ने लाखों लोगों को वो अवसर दिया, जो सरकारें सालों में भी नहीं दे पाईं।

आज अगर इस डिजिटल अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी गई तो इसका असर सिर्फ कमाई तक नहीं रहेगा—यह ग्रामीण भारत में निराशा, शहरों में बेरोज़गारी और समाज में आक्रोश की आग बनकर फैलेगा। और तब सरकार के पास फिर वही पुराना इलाज बचेगा भाषण, आंकड़े और “हमने बहुत किया” वाला रोना।

अगर सरकार को सचमुच पैसा चाहिए तो उन जगहों पर हाथ डाले जहां अरबों-खरबों की चोरी छुपी है। टैक्स चोरी करने वाले बड़े खिलाड़ी, एनपीए के नाम पर डकारे गए हजारों करोड़, और सफेद कॉलर सिस्टम में बैठे वो लोग जो हर घोटाले के बाद भी साफ सूट पहनकर घूमते रहते हैं। लेकिन नहीं, सबसे आसान शिकार कौन है? वही छोटा क्रिएटर, वही गरीब डिजिटल मेहनतकश, वही युवा जिसने सरकारी नौकरी की उम्मीद छोड़कर इंटरनेट के भरोसे खुद का रोजगार बनाया।
अब वक्त है कि सरकार यानी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी को यह तय करना होगा कि वह किसके साथ है। उन करोड़ों भारतीयों के साथ जो मोबाइल और इंटरनेट के सहारे अपनी जिंदगी आगे बढ़ा रहे हैं, या फिर उन सलाहकारों के साथ जो एसी कमरों में बैठकर जनता की कमाई पर टैक्स लगाने को “स्मार्ट फैसला” बताते हैं। क्योंकि अगर बिना सुरक्षा और बिना समझ के सोशल मीडिया पर टैक्स थोपा गया, तो यह आर्थिक सुधार नहीं कहलाएगा बल्कि यह डिजिटल बेरोज़गारी का सरकारी फरमान होगा।

@देवेंद्र किशोर गुप्ता, संपादक- 9039010330


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