Sunday | Jun 21, 2026
The Raw File

जनता टैक्स दे, सिस्टम लूट मचाए? बजट के आईने में यही है भारत की कड़वी सच्चाई!

रॉ फाइल / केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज देश का बजट सदन में प्रस्तुत किया।आपको पता ही है की देश का बजट हर साल बनता है। हर साल संसद में लाखों करोड़ रुपये के आंकड़े गिनाए जाते हैं। हर बार कहा जाता है कि यह बजट गरीब, मध्यम वर्ग, किसान, युवा और भविष्य के भारत के लिए है। योजनाओं के नाम बदलते हैं, स्लोगन बदलते हैं, लेकिन एक सवाल हर साल जस का तस खड़ा रहता है अगर बजट और योजनाएँ इतनी ही प्रभावी हैं, तो आम आदमी का जीवन आखिर क्यों नहीं बदल रहा?
आज भी सरकारी स्कूलों की हालत चिंताजनक है। सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ता है। किसान आज भी बदहाल है। लोकहितकारी सरकारी योजनाएं दुर्गति की शिकार है। सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हुआ है और न्याय आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है।यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस सिस्टम की सच्चाई है जिसमें ईमानदार नीयत ऊपर तक सीमित रह जाती है और नीचे भ्रष्टाचार का जाल फैलता चला जाता है।

अकेले मोदी के ईमानदार होने से कोई फर्क नहीं पड़ता!
यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इंडिया, वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका और आर्थिक आकार इन सबमें देश आगे बढ़ा है। यह भी सच है कि मौजूदा बजट में सड़क, रेलवे, एयरपोर्ट और पूंजीगत खर्च पर जोर दिया गया है और निर्मला सीतारमण ने आंकड़ों के जरिए विकास का भरोसा दिलाने की कोशिश की है। लेकिन सवाल आंकड़ों का नहीं, जमीन पर असर का है। पर अकेले प्रधानमंत्री का ईमानदार होना काफी नहीं है, जब सिस्टम में बेईमान नेताओं और अफसरों की भरमार हो। योजनाएँ बनती हैं, पैसा आवंटित होता है, लेकिन वही पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। जनता टैक्स देती है और उसका पैसा नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों की जेब में घूमता रहता है।

पिस रहा है मध्यमवर्ग!
आज का मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा पिसा हुआ वर्ग है। इनकम टैक्स, जीएसटी, पेट्रोल-डीज़ल टैक्स, बिजली, टोल हर स्तर पर टैक्स ही टैक्स। सवाल यह है कि जब अप्रत्यक्ष करों से ही सरकार को इतना राजस्व मिल रहा है, तो इनकम टैक्स की जरूरत क्यों है? ऐसा लगता है जैसे लोग अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि सरकार और सिस्टम चलाने के लिए कमा रहे हैं। मेहनत जनता करे, टैक्स जनता दे और ऐश सरकार में बैठे लोग और अफसर करें।

सक्षम व्यक्ति क्यों देश छोड़ने का विकल्प तलाशने लगता है?

फ्री स्कीम के नाम पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। गरीबों की मदद जरूरी है, लेकिन क्या यह मदद टैक्सदाताओं के पैसे से वोट बैंक मजबूत करने का साधन बनती जा रही है? राज्यों की आर्थिक स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है, कर्ज बढ़ता जा रहा है, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्त घोषणाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं। इसका बोझ अंततः उसी टैक्सदाता पर पड़ता है, जो पहले से ही दबाव में है।
यही कारण है कि जैसे ही कोई व्यक्ति थोड़ा सक्षम होता है, वह देश छोड़ने का विकल्प तलाशने लगता है। पढ़ा-लिखा युवा यह महसूस करता है कि वह ईमानदारी से टैक्स देता है, लेकिन बदले में न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है, न स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही सिस्टम का भरोसा। यह पलायन किसी देशभक्ति की कमी का नहीं, बल्कि व्यवस्था से मोहभंग का परिणाम है।

भारत का सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार!
राजनीति में भी यही तस्वीर है। लोगों की भावनाओं को उकसाकर, डर या पहचान की राजनीति के सहारे सत्ता हासिल कर ली जाती है। लेकिन सत्ता बदलने के बाद हालात वही रहते हैं। मोदी सरकार के दौर में देश आगे जरूर बढ़ा है, लेकिन यह भी सच है कि कई राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर है। इस सच्चाई से आंख मूंद लेना खतरनाक होगा। भाजपा कहती है कि सत्ता सेवा का माध्यम है, तो यह सेवा जमीन पर दिखनी चाहिए। भाषणों और नारों से आगे बढ़कर सिस्टम की सफाई करनी होगी। क्योंकि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कोई बाहरी ताकत नहीं, बल्कि भीतर फैला भ्रष्टाचार है। यही भ्रष्टाचार आम आदमी के जीवन को नर्क बना रहा है। जब तक टैक्स का पैसा ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ खर्च नहीं होगा, तब तक हर बजट अधूरा ही रहेगा। अब सवाल यह नहीं कि बजट कितना बड़ा है, सवाल यह है कि जनता को फायदा क्यों नहीं दिखता?

@ देवेन्द्र किशोर गुप्ता,पत्रकार/ राजनीतिक विश्लेषक 


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