Sunday | Jun 21, 2026
The Raw File

पाटन में दस्तक या शक्ति प्रदर्शन? देवेंद्र यादव की जुर्रत से गरमाई कांग्रेस की राजनीत

दुर्ग/ पाटन केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, यह पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की राजनीतिक कर्मभूमि और कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। वर्षों से यहां होने वाली बड़ी राजनीतिक गतिविधियों पर भूपेश बघेल की छाप साफ दिखाई देती रही है। ऐसे में 8 जून को युवा कांग्रेस सदस्यता अभियान के नाम पर भिलाई विधायक देवेंद्र यादव और पूर्व मंत्री रूद्र गुरु का पाटन क्षेत्र में अलग से शक्ति प्रदर्शन कई सवाल खड़े कर गया है।

दिलचस्प बात यह है कि दो-तीन दिन पहले ही इसी सदस्यता अभियान का एक बड़ा कार्यक्रम पाटन में आयोजित हुआ था, जिसमें भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष राकेश ठाकुर और स्थानीय संगठन पूरी ताकत से मैदान में था। ऐसे में इतने कम अंतराल में बिल्कुल वैसा ही दूसरा कार्यक्रम  पाटन के जामगांव में किया और उसमें भूपेश बघेल एवं उनके करीबियों की अनुपस्थिति बताती है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह केवल सदस्यता अभियान नहीं था बल्कि कांग्रेस के भीतर उभरते शक्ति केंद्रों का प्रदर्शन था।

वैसे भी कांग्रेस इन दिनों अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रही है। भूपेश बघेल का मुख्यमंत्री कार्यकाल उपलब्धियों के साथ-साथ विवादों के कारण भी चर्चा में रहा। कई अफसर, नेता यहां तक की उनके पुत्र चैतन्य भी घोटालों के आरोप में जेल यात्रा कर चुके हैं। दूसरी ओर देवेंद्र यादव स्वयं बलौदा बाजार हिंसा प्रकरण में घिरे हुए है वो भी जेल से होकर लौट चुके है। ऐसे में कांग्रेस के दो बड़े चेहरों के बीच किसी भी प्रकार की खींचतान पार्टी को मजबूत करने की बजाय कमजोर ही करेगी।

हालांकि राजनीतिक कद की बात करें तो भूपेश बघेल आज भी छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता माने जाते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रभाव दोनों बढ़े हैं। कांग्रेस में कई चेहरे हैं, लेकिन लोकप्रियता और संगठनात्मक पकड़ के मामले में वे अब भी पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

दूसरी तरफ देवेंद्र यादव भी अब कोई साधारण नेता नहीं हैं। छात्र राजनीति और संघर्ष की जमीन से निकलकर वे लगातार दो बार भिलाई से विधायक बने हैं। युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ है, उनकी आक्रामक शैली उन्हें अलग पहचान देती है। राहुल गांधी और दिल्ली नेतृत्व से उनकी निकटता भी अक्सर चर्चा में रहती है। यही वजह है कि उनके समर्थक उन्हें कांग्रेस की नई पीढ़ी के बड़े चेहरे के रूप में देखते हैं।

लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति केवल दिल्ली दरबार की कृपा से नहीं चलती। यहां आज भी जमीन से जुड़ाव, स्थानीय स्वीकार्यता और “ठेठ छत्तीसगढ़िया” पहचान का अपना अलग महत्व है। इस कसौटी पर भूपेश बघेल की पकड़ कहीं अधिक मजबूत मानी जाती है।

यही कारण है कि पाटन में देवेंद्र यादव की यह सक्रियता कई लोगों को राजनीतिक साहस से ज्यादा राजनीतिक जुर्रत लग रही है। ऐसे में सवाल उठता, है कि क्या वे इतनी जल्दी उस राजनीतिक क्षेत्र में कदम रख रहे हैं जहां अभी भी भूपेश बघेल का प्रभाव निर्विवाद माना जाता है?

पाटन की राजनीति में यह पहला अवसर नहीं है। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री स्व.अजीत जोगी भी कांग्रेस में रहते हुए भूपेश बघेल के गढ़ में स्वतंत्र कार्यक्रम करते रहे थे। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दोनों नेताओं के बीच बढ़ी दूरियों की एक वजह यह समानांतर राजनीतिक सक्रियता भी थी। ऐसे में अब सतनामी समाज के प्रभावशाली नेता और पूर्व मंत्री रूद्र गुरु के साथ देवेंद्र यादव का पाटन में अभियान कई सवाल खड़े करता है। इसे केवल सदस्यता अभियान माना जाए या कांग्रेस के भीतर नए राजनीतिक समीकरणों की आहट, इस पर चर्चाएं तेज हैं।

देवेंद्र यादव महत्वाकांक्षी हैं, संघर्षशील हैं और लोकप्रिय भी। वहीं भूपेश बघेल अनुभवी हैं, जनाधार वाले हैं और आज भी कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हैं। लेकिन राजनीति में कई बार महत्वाकांक्षा और प्रभाव का टकराव ऐसी दरारें पैदा कर देता है, जिनका फायदा विरोधी दल उठाते हैं।

फिलहाल पाटन की इस हलचल ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है क्या देवेंद्र यादव केवल संगठन का विस्तार कर रहे हैं या फिर छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अपनी अलग राजनीतिक लकीर खींचने की तैयारी भी कर रहे हैं? समझने वाली बात है कि आजकल राजनीति में उत्तराधिकारी घोषित नहीं होते, वे अपनी ताकत से उभरते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस में आज भी भूपेश बघेल वह बरगद हैं, जिसकी छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाना आसान नहीं है।

देवेंद्र यादव ने जिस मैदान में कदम रखा है, वहां साहस की जितनी जरूरत है, उतनी ही राजनीतिक धैर्य की भी। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह शक्ति प्रदर्शन था, संदेश था या फिर कांग्रेस के भीतर शुरू हुई नए सत्ता-संघर्ष की प्रस्तावना। लेकिन इतना तय है कि पाटन में चली इस राजनीतिक चाल ने कांग्रेस के भीतर की बेचैनी को सार्वजनिक कर दिया है और अब सबकी नजर अगले कदम पर टिकी है।


Raw File



संबंधित खबरें