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सालों की नींद के बाद जागा रेरा, बिल्डर लॉबी में मचा हड़कंप

Raw File | 07 Jun 2026 | कानून, छत्तीसगढ़

595 बिल्डरों को नोटिस: क्या अब टूटेगा बिल्डर-रेरा गठजोड़ का ?

रायपुर। छत्तीसगढ़ रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (CGRERA) द्वारा 595 प्रमोटरों और 989 परियोजनाओं को एक साथ नोटिस जारी करना राज्य के रियल एस्टेट इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि जिन परियोजनाओं का निर्माण पूरा हो चुका है, वहां आवंटियों की सोसायटी/एसोसिएशन का गठन नहीं किया गया, कॉमन एरिया का हस्तांतरण नहीं हुआ और प्रबंधन का अधिकार भी निवासियों को नहीं सौंपा गया है। 15 दिन के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर विधिसम्मत कार्रवाई और प्रकरण दर्ज करने की चेतावनी भी दी गई है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के लिए है, या फिर बढ़ते जनदबाव के बाद रेरा की मजबूरी बन गई है?

पिछले कई महीनों से रायपुर में बिल्डरों की मनमानी के खिलाफ आवाजें उठ रही थीं। तेजतर्रार भाजपा नेता और समाजसेवी गोपाल सामंतों लगातार विभिन्न कॉलोनियों में जाकर रहवासियों को संगठित कर रहे थे। फलस्वरूप पानी, सड़क, सुरक्षा, रखरखाव, ओपन स्पेस पर अवैध निर्माण, क्लब हाउस और अन्य वादों से बिल्डरों के मुकरने जैसे मुद्दों पर लोगों ने खुलकर विरोध शुरू किया। खास बात यह है कि गोपाल सामंतों खुद भी अविनाश बिल्डकॉन की ऐसी कॉलोनी के रहवासी हैं जहां बिल्डर खुद वादाखिलाफी के आरोपों से घिरे है।

वर्षों से यह शिकायत आम रही है कि रायपुर और आसपास की बड़ी-बड़ी टाउनशिपों में फ्लैट और प्लॉट बेचने के समय जो सपने दिखाए गए, कब्जा मिलने के बाद वे हवा हो गए। कहीं पार्क सिकुड़ गए, कहीं ओपन स्पेस पर निर्माण शुरू हो गया, कहीं सुरक्षा व्यवस्था अधूरी रह गई और कहीं मूलभूत सुविधाएं ही नहीं मिलीं। शिकायतें होती रहीं, लेकिन कार्रवाई का अभाव लोगों के मन में यह धारणा मजबूत करता रहा कि रेरा का पूरा ढांचा बिल्डरों की सुविधा के लिए ज्यादा सक्रिय है, ग्राहकों के अधिकारों के लिए कम।

यही कारण है कि अब जब एक साथ 595 प्रमोटरों को नोटिस मिला है, तो इसे केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि जनता के दबाव की जीत भी माना जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि रेरा कानून 2016 से लागू है, तो फिर हजारों आवंटियों को वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ा? यदि कॉमन एरिया और सोसायटी हस्तांतरण कानूनी दायित्व था, तो इतने बड़े पैमाने पर उल्लंघन आखिर रेरा की नजरों से कैसे बचता रहा?

वास्तविकता यह है कि छत्तीसगढ़ में कई बिल्डर परियोजनाओं को पूरा दिखाकर लाभ कमाते रहे, लेकिन जिम्मेदारियों से बचते रहे। दूसरी ओर नियामक संस्थाओं की सुस्ती ने उन्हें यह संदेश दिया कि नियम तोड़ने की कीमत बहुत कम है। अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था ने फाइलों से निकलकर जमीन की ओर देखना शुरू किया है।

हालांकि केवल नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि 15 दिन बाद भी कार्रवाई फाइलों में दब गई तो यह पूरा अभियान एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि दोषी प्रमोटरों पर वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई हो, सोसायटियों का गठन हो, कॉमन एरिया का हस्तांतरण हो और रहवासियों को उनका वैधानिक अधिकार मिले।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार को यदि वास्तव में सुशासन को अपनी पहचान बनाना है तो रेरा जैसी संस्थाओं की जवाबदेही तय करनी होगी। जनता यह जानना चाहती है कि वर्षों तक शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई और रेरा चेयरमैन संजय शुक्ला की जिम्मेदारी क्या है? जिनके कार्यकाल में बिल्डरों की मनमानी बढ़ती गई। सुशासन का अर्थ केवल नई कार्रवाई करना नहीं, बल्कि पुरानी निष्क्रियता का भी हिसाब लेना है।

595 बिल्डरों को नोटिस एक शुरुआत है, लेकिन जनता की नजर अब अगले कदम पर है। क्योंकि छत्तीसगढ़ के हजारों परिवारों को नोटिस नहीं, न्याय चाहिए। और यदि इस बार भी बिल्डर लॉबी बच निकली, तो सबसे बड़ा कटघरे में रेरा ही नहीं दोषियों को संरक्षण देने वाले दिग्गज भी होंगे।


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