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The Raw File

राष्ट्रपति मुर्मू का दर्द छलका, बोलीं “ममता मेरी छोटी बहन हैं… आखिर नाराज़ क्यों?”

कोलकाता/ सिलीगुड़ी में 9वें इंटरनेशनल संथाल कॉन्फ्रेंस के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नाराज़गी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मुर्मू जब उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी पहुंचीं तो यह कार्यक्रम उनके लिए केवल औपचारिक नहीं बल्कि अपने समाज और संस्कृति से जुड़ा एक भावनात्मक अवसर था।

लेकिन सम्मेलन की व्यवस्था और राज्य सरकार की अनुपस्थिति ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा व्यक्त करने पर मजबूर कर दिया। यह सम्मेलन मूल रूप से सिलीगुड़ी के बिधाननगर में आयोजित होना था, जहां बड़ी संख्या में संथाल समुदाय के लोगों के जुटने की संभावना थी। लेकिन प्रशासन ने अंतिम समय में कार्यक्रम का स्थान बदलकर बागडोगरा एयरपोर्ट के पास गोंसाईपुर कर दिया। दूरस्थ और सीमित जगह होने के कारण सम्मेलन में बहुत कम लोग पहुंच सके।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति मुर्मू ने इस स्थिति पर गहरी निराशा जताते हुए सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्या कारण था कि कार्यक्रम का स्थान बदल दिया गया और संथाल समुदाय के लोग बड़ी संख्या में इसमें शामिल नहीं हो सके। उन्होंने भावुक अंदाज में कहा कि क्या किसी को यह अच्छा नहीं लगता कि संथाल समाज एकजुट हो, पढ़े-लिखे और आगे बढ़े। राष्ट्रपति ने इस दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लेते हुए कहा कि वह उनकी छोटी बहन जैसी हैं और उन्हें नहीं पता कि आखिर वह उनसे नाराज़ क्यों हैं। उनका यह बयान राजनीतिक टिप्पणी से ज्यादा एक भावनात्मक संदेश जैसा लगा, जिसमें एक संवैधानिक प्रमुख की पीड़ा साफ झलक रही थी।

इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा अहम पहलू यह रहा कि राष्ट्रपति के कार्यक्रम में न तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौजूद थीं और न ही राज्य सरकार का कोई मंत्री। परंपरा और प्रोटोकॉल के अनुसार जब राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर आते हैं तो मुख्यमंत्री या सरकार का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि उनका स्वागत करने के लिए उपस्थित रहता है। लेकिन इस कार्यक्रम में ऐसा नहीं हुआ, जिसे लेकर भी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में अप्रत्यक्ष रूप से नाराज़गी जाहिर की।

राष्ट्रपति मुर्मू स्वयं संथाल समुदाय से आती हैं, इसलिए यह सम्मेलन उनके लिए केवल एक मंच नहीं बल्कि अपने समाज की एकता, शिक्षा और विकास का प्रतीक था। ऐसे में कार्यक्रम की कमजोर व्यवस्था और कम उपस्थिति ने उन्हें आहत किया। इस घटना के बाद मामला राजनीतिक बहस में भी बदल गया। केंद्र की ओर से इसे राष्ट्रपति और आदिवासी समाज के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताया गया, वहीं राज्य सरकार की ओर से इस पर अलग प्रतिक्रिया सामने आई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संवैधानिक पदों और सामाजिक आयोजनों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए। राष्ट्रपति मुर्मू के शब्दों में जो पीड़ा झलकी, वह केवल एक कार्यक्रम की अव्यवस्था की शिकायत नहीं थी, बल्कि उसमें आदिवासी समाज की एकता, सम्मान और पहचान की चिंता भी साफ दिखाई दे रही थी।


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