लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का काम जनता के सवालों का जवाब देना होता है, न कि सवाल पूछने वालों को अपराधी बनाना। चिरमिरी के वरिष्ठ नागरिक द्वारा जनप्रतिनिधियों के कथित भ्रष्टाचार को इंगित करने वाला एक पोस्ट किया गया। पश्चात जनप्रतिधियों द्वारा उनके खिलाफ संगठित होकर थाने में fir की कोशिश हो रही है। यह घटना सभी के लिए चेतावनी है कि अगर आज इस प्रवृत्ति का विरोध नहीं हुआ, तो कल लोकतांत्रिक अधिकार सिर्फ कागज़ों में रह जाएंगे और ज़मीन पर केवल सत्ता की भाषा ही बोली जायेगी।
रायपुर ब्यूरो/ अंजनी हिल ओपन कास्ट माइंस परियोजना को लेकर उठे सवालों ने चिरमिरी की राजनीति और सत्ता संरचना की असहज सच्चाई को एक बार फिर उजागर कर दिया है। एक सामान्य नागरिक प्रदीप सलूजा की फेसबुक पोस्ट, जिसमें न तो किसी महापौर का नाम है, न किसी पार्षद का, न ही सीधे चिरमिरी शहर का उल्लेख। उस पर सीधे थाने में शिकायत दर्ज करा देना, वह भी नगर निगम चिरमिरी के महापौर सहित भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों के संयुक्त हस्ताक्षर के साथ, यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर डर किसे है और क्यों। 
यह घटना बताती है कि जब जनता के बीच से कोई आवाज़ उठती है, तो जवाब देने, तथ्य रखने या स्पष्टीकरण देने की बजाय सत्ता-नेता दमन और डराने की रणनीति पर उतर आता है। सोशल मीडिया पोस्ट को “मान-सम्मान को ठेस” बताकर अपराध की श्रेणी में डाल देना, जबकि पोस्ट में किसी का नाम तक नहीं है, यह दर्शाता है कि अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सत्ता की अनुमति से तय की जा रही है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा और कांग्रेस का एकजुट होकर थाने पहुंचना किसी राजनीतिक संयोग से ज्यादा संगठित सत्ता-संरक्षण की ओर इशारा करता है। जो दल सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के धुर विरोधी होने का दावा करते हैं, वही दल जनता के सवालों के सामने एक साथ खड़े नजर आते हैं। यह गठजोड़ बताता है कि मुद्दा पार्टी का नहीं, हितों की साझेदारी का है। 
इसी पृष्ठभूमि में प्रदीप सलूजा पर कार्रवाई का प्रयास और भी सवाल पैदा करता है। प्रदीप सलूजा कोई नए या बाहरी व्यक्ति नहीं हैं। वे उन लोगों में शामिल रहे हैं जिन्होंने चिरमिरी क्षेत्र में भाजपा की नींव रखने में भूमिका निभाई। लरंग साय,शिवप्रताप सिंह,रामविचार नेताम, मेजर अनिल सिंह, रवि त्रिपाठी,बाबूलाल अग्रवाल जैसे नेताओं के साथ उनका राजनीतिक सफर रहा है। 1986 संयुक्त सरगुजा जिले के भाजयुमो अध्यक्ष रहे है। इसके बावजूद आज वही व्यक्ति “अपराधी” की तरह कटघरे में खड़ा किया जा रहा है वो भी सिर्फ इसलिए कि उन्होंने एक संवेदनशील परियोजना को लेकर सवाल उठाने का साहस किया।
खास बात यह है कि स्वयं प्रदीप सलूजा ने भी इस पूरे विवाद में संयम दिखाया है। मंत्री की भूमिका पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वे मंत्री पर कुछ नहीं कहना चाहते, उन्हें छोटा भाई मानते हैं और उनका विवेक उन पर छोड़ते हैं। लेकिन यह संयम, सत्ता की जिम्मेदारी को कम नहीं करता। जब सत्ता समर्थक खामोश रहते हैं और सवाल पूछने वालों पर मुकदमे लादे जाते हैं, तब यह साफ हो जाता है कि उद्देश्य सत्य सामने लाना नहीं, बल्कि डर का माहौल बनाना है।

यह मामला सिर्फ एक पोस्ट या एक व्यक्ति का नहीं है। यह उस प्रवृत्ति का उदाहरण है, जिसमें पूंजी, सत्ता और प्रशासन मिलकर जनता को यह संदेश देना चाहते हैं कि सवाल पूछने की कीमत चुकानी पड़ेगी। आज अगर प्रदीप सलूजा निशाने पर हैं, तो कल कोई भी जागरूक नागरिक हो सकता है।
हमने पहले भी देखा है कि ग्राम क्रांति और रॉ फाइल के संपादक पत्रकार देवेंद्र किशोर गुप्ता के खिलाफ भी ऐसा ही उपक्रम किया गया। अपने मंत्री श्यामबिहारी जयसवाल की मानहानि का हवाला देकर इन्हीं समर्थकों द्वारा देवेंद्र के खिलाफ भी अपराध दर्ज कराने का प्रयास हुआ। इस मामले में पुलिस ने जब यह अनैतिक कृत्य करने से मना किया तो उन्होंने कोर्ट का रुख कर लिया जो की कानून की आड़ लेकर डराने का प्रयास ही रहा।