रायपुर/ सूचना का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखने वाला सबसे प्रभावी माध्यम है। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि सत्ता से जवाबदेही तय करने की नागरिक शक्ति है। लेकिन जब इसी अधिकार को संचालित करने वाली संस्था की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होने लगें, तो चिंता केवल व्यवस्था की नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य की हो जाती है। छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में राज्य की पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन की नियुक्ति को लेकर उठने वाला सवाल इसी गहरी चिंता का प्रतीक है।
यह अब कोई अपवाद नहीं रहा कि लंबे समय तक शासन-प्रशासन के शीर्ष पर रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों को सूचना आयोग जैसे संवेदनशील पदों पर बैठा दिया जाए। बहस इस बात की नहीं है कि ऐसी नियुक्तियाँ नियमों के दायरे में हैं या नहीं, असली प्रश्न यह है कि क्या वे लोकतांत्रिक भावना और नैतिक कसौटी पर खरी उतरती हैं?
मुख्य सचिव का पद केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं होता, वह पूरे सिस्टम की दिशा और चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है। नीतियों की कमियाँ, योजनाओं की असफलताएँ, सूचनाओं पर लगाई गई बंदिशें और फाइलों के पीछे छिपी गोपनीयता—इन सबकी नैतिक जवाबदेही शीर्ष पर बैठे अधिकारी से अलग नहीं की जा सकती। सरकारें बदलती रही हों, चाहे कांग्रेस रही हो या भाजपा, लेकिन प्रशासनिक निरंतरता का केंद्र वही अधिकारी वर्ग रहा है।
ऐसे में यह अपेक्षा करना कि जो व्यक्ति वर्षों तक सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करता रहा हो, वही सेवानिवृत्ति के बाद सूचना का सबसे बड़ा संरक्षक बन जाएगा, एक असहज और अव्यावहारिक कल्पना लगती है। यह व्यवस्था कम और अपने ही तंत्र की निगरानी खुद से करवाने जैसा प्रयोग अधिक प्रतीत होती है।
सूचना आयोग का उद्देश्य सरकार को ढाल देना नहीं, बल्कि नागरिक को सवाल पूछने का साहस और ताकत देना है। यदि आयोग की कमान उन्हीं हाथों में हो, जो कभी सत्ता को असुविधाजनक सवालों से बचाने की रणनीति का हिस्सा रहे हों, तो फिर सूचना आयोग और सचिवालय के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है।
मै यह स्पष्ट कर दु कि यह विमर्श किसी एक व्यक्ति की नीयत या ईमानदारी पर केंद्रित नहीं है। यह उस खतरनाक परंपरा पर सवाल है, जिसमें सत्ता से औपचारिक सेवानिवृत्ति के बाद भी सत्ता की छाया बनी रहती है। यही वजह है कि आम नागरिक के मन में यह संदेह गहराने लगा है कि कहीं सूचना आयोग रिटायरमेंट के बाद की ‘पार्किंग पोस्ट’ तो नहीं बनते जा रहे।
यदि सरकारें सचमुच पारदर्शिता को मजबूत करना चाहती हैं, तो उन्हें साहसिक निर्णय लेने होंगे—सूचना आयोग जैसे पदों पर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों या ऐसे स्वतंत्र व्यक्तित्वों को नियुक्त करना होगा, जिनका पूर्व प्रशासनिक फैसलों से सीधा जुड़ाव न रहा हो।
लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, वह भरोसे से चलता है। और भरोसा वहीं टूटता है, जहाँ वही तंत्र खुद का न्यायाधीश बन बैठता है। सूचना आयोग को सशक्त बनाना है तो परंपरा नहीं, नियत बदलनी होगी। अन्यथा सूचना का अधिकार किताबों में सजा रहेगा।
(देवेंद्र किशोर गुप्ता, संपादक-रॉ फाइल)