गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बिलासपुर में राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान जो दृश्य सामने आया, वह शैक्षणिक परंपराओं के लिए शर्मनाक है। मंच पर संवाद होना था, विचार टकराने थे, लेकिन वहां अहंकार ने साहित्य को अपमानित कर दिया।
गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने जिस तरह अतिथि कथाकार मनोज रूपड़ा को सार्वजनिक मंच से अपमानित करते हुए बाहर निकलवाया, वह किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और अकादमिक व्यवस्था में अस्वीकार्य है। “यहां से जाओ”, “मंच छोड़ो” जैसे शब्द किसी कुलपति की जुबान से नहीं, किसी तानाशाह मानसिकता से निकलते हैं।
मनोज रूपड़ा ने कोई अभद्र भाषा नहीं अपनाई। उन्होंने केवल इतना कहा कि अध्यक्षीय वक्तव्य विषय से भटक रहा है और मूल विषय पर बात होनी चाहिए। सवाल यह है—क्या अब विश्वविद्यालयों में विषय पर टिके रहने की बात कहना भी अपराध हो गया है? अगर हां, तो फिर “राष्ट्रीय परिसंवाद” सिर्फ औपचारिक तमाशा रह जाता है।
गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बिलासपुर में राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने जिस तरह अतिथि कथाकार मनोज रूपड़ा को सार्वजनिक मंच से अपमानित करते हुए बाहर निकलवाया, वह किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और अकादमिक व्यवस्था में अस्वीकार्य है। pic.twitter.com/lqvlvb1UBi
— Devendra gupta (@Devendra_gupta0) January 9, 2026
कुलपति पद सत्ता का सिंहासन नहीं, बल्कि संयम और संतुलन की जिम्मेदारी है। असहमति को सुनने की क्षमता ही किसी शिक्षाविद् की असली पहचान होती है। लेकिन यहां तो असहमति को सुरक्षा कर्मियों के जरिए बाहर फेंक दिया गया। यह केवल एक साहित्यकार का अपमान नहीं, बल्कि पूरे साहित्यिक समाज के मुंह पर तमाचा है।
और भी चिंताजनक है विश्वविद्यालय प्रशासन की सफाई कि “कुलपति पद की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसा करना पड़ा।”यह तर्क खोखला है। गरिमा आवाज ऊंची करने से नहीं, स्तर ऊंचा रखने से आती है।
अगर किसी की एक टिप्पणी से कुलपति की गरिमा डगमगा जाती है, तो समस्या टिप्पणी में नहीं, कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की मानसिकता में है। इस घटना के बाद अन्य साहित्यकारों का विरोध में सभागार छोड़ना बताता है कि मामला व्यक्तिगत नहीं था। यह अहंकार बनाम विचार की टकराहट थी और दुर्भाग्य से विश्वविद्यालय प्रशासन ने विचारों के खिलाफ खड़े होने का रास्ता चुना। यह सिर्फ गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी का मामला नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की शैक्षणिक और सांस्कृतिक छवि से जुड़ा प्रश्न है।
अब माननीय राष्ट्रपति, माननीय राज्यपाल, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस पूरे प्रकरण पर कड़ा संज्ञान लें। ऐसे कुलपति, जिनका व्यवहार साहित्य और संवाद के विरुद्ध है, वे किसी भी राज्य की बौद्धिक विरासत के संरक्षक नहीं हो सकते।
आज एक साहित्यकार को मंच से निकाला गया है। कल सवाल पूछने वाला छात्र होगा।परसों असहमति रखने वाला शिक्षक।विश्वविद्यालय डर से नहीं, संवाद से चलते हैं।और जहां संवाद की जगह दंभ ले ले, वहां शिक्षा नहीं—सिर्फ सत्ता बचती।
@देवेन्द्र किशोर गुप्ता